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सऊदी–पाक रक्षा समझौते में तुर्की की एंट्री संभव, ‘इस्लामिक नाटो’ की चर्चा तेज

Published on: January 20, 2026
Saudi-Pakistan defense agreement
द देवरिया न्यूज़,अंकारा। सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए स्ट्रेटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट (SMDA) में तुर्की के शामिल होने की संभावना प्रबल होती जा रही है। तीनों देशों के बीच इस मुद्दे पर बातचीत अंतिम चरण में बताई जा रही है और जल्द ही औपचारिक घोषणा हो सकती है। यदि तुर्की इस समझौते का हिस्सा बनता है तो यह व्यवस्था नाटो की तर्ज पर सामूहिक रक्षा सिद्धांत पर काम करेगी, जिसमें एक देश पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा।
इस संभावित गठजोड़ ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘इस्लामिक नाटो’ जैसी बहस को फिर से हवा दे दी है। जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की का एक साथ आना न केवल सैन्य बल्कि आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से भी एक मजबूत ब्लॉक का रूप ले सकता है, जिस पर वैश्विक शक्तियों की नजर टिकी हुई है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, तुर्की इस समय सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ मौजूदा रक्षा ढांचे में शामिल होने के लिए गंभीर बातचीत कर रहा है। यह वार्ता एडवांस स्टेज में है और समझौते के बेहद करीब पहुंच चुकी है। तुर्की के जुड़ने के बाद तीनों देश नाटो के आर्टिकल-5 जैसे सामूहिक रक्षा प्रावधान से बंध सकते हैं।
यह समझौता इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि तीनों देशों की ताकतें एक-दूसरे को पूरक बनाती हैं। सऊदी अरब के पास मजबूत अर्थव्यवस्था, वित्तीय संसाधन और खाड़ी क्षेत्र में प्रभावशाली कूटनीतिक पकड़ है। पाकिस्तान के पास बड़ी और अनुभवी सेना के साथ-साथ परमाणु क्षमता है। वहीं तुर्की की पारंपरिक सैन्य शक्ति और तेजी से बढ़ता रक्षा उद्योग इस गठजोड़ को तकनीकी और रणनीतिक मजबूती प्रदान कर सकता है। तीनों की संयुक्त क्षमताएं एक संगठित और प्रभावी सुरक्षा ढांचा तैयार कर सकती हैं।
हालांकि तुर्की नाटो का सदस्य है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार किसी अलग रक्षा समझौते में उसकी भागीदारी नाटो नियमों का सीधा उल्लंघन नहीं होगी। फिर भी इससे पश्चिमी देशों के साथ उसके रिश्तों में जटिलता बढ़ सकती है। अंकारा स्थित एक थिंक टैंक के रणनीतिकार निहत अली ओजकान का कहना है कि अमेरिका द्वारा क्षेत्र में इजरायल के हितों को प्राथमिकता दिए जाने से तुर्की जैसे देश वैकल्पिक सुरक्षा तंत्र तलाशने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह त्रिपक्षीय रक्षा व्यवस्था अस्तित्व में आती है, तो यह मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया के सुरक्षा संतुलन में बड़ा बदलाव ला सकती है और आने वाले समय में क्षेत्रीय राजनीति को नई दिशा दे सकती है।

इसे भी पढ़ें : देवरिया में प्लॉटिंग का रहस्य: न कस्बा, न सुविधाएं, फिर भी करोड़ों की जमीन और चली गोलियां


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