विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर ऐसा होता है तो यह कदम खाड़ी देशों, खासकर सऊदी अरब और यूएई के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों को उजागर करेगा। दोनों देशों के बीच मुख्य विवाद तेल उत्पादन की रणनीति को लेकर रहा है। सऊदी अरब जहां कीमतों को स्थिर रखने के लिए उत्पादन सीमित करने के पक्ष में रहा है, वहीं यूएई अधिक उत्पादन कर बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने की रणनीति अपनाना चाहता है।
ग्लोबल रिस्क मैनेजमेंट के विश्लेषकों का मानना है कि यूएई की “वॉल्यूम स्ट्रैटेजी” यानी अधिक उत्पादन की नीति, सऊदी अरब की “प्राइस स्ट्रैटेजी” से अलग है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच नीतिगत टकराव समय-समय पर सामने आता रहा है।
आर्थिक दृष्टि से भी दोनों देशों की प्राथमिकताएं अलग हैं। सऊदी अरब के पास बड़े पैमाने पर तेल भंडार और बड़ी आबादी है, जबकि यूएई की आबादी अपेक्षाकृत कम है और उसने तेल उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए भारी निवेश किया है। ऐसे में यूएई अधिक उत्पादन कर तत्काल लाभ लेने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है।
कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि यूएई का रुख केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी हो सकता है। खाड़ी क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक समीकरण, अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते संबंध, और ईरान को लेकर तनाव जैसे कारक भी इस दिशा में भूमिका निभा सकते हैं।
हालांकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि मौजूदा वैश्विक हालात—जैसे ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव—किसी भी बड़े फैसले को और जटिल बना देते हैं। यदि यूएई वास्तव में OPEC से अलग होता है, तो इसका असर वैश्विक तेल आपूर्ति, कीमतों और बाजार संतुलन पर पड़ सकता है।
फिलहाल, आधिकारिक घोषणा का इंतजार है। लेकिन इतना तय है कि यूएई और सऊदी अरब के बीच रणनीतिक मतभेद भविष्य में OPEC की भूमिका और प्रभाव को प्रभावित कर सकते हैं।