द देवरिया न्यूज़,इस्लामाबाद : ईरान-अमेरिका संघर्ष के दौरान पाकिस्तान की भूमिका को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान ने चुपचाप ईरानी सैन्य और निगरानी विमानों को अपने एयरबेस पर शरण दी थी। हालांकि पाकिस्तान ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि संबंधित विमान केवल राजनयिक और प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए आए थे।
सीबीसी न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के दौरान पाकिस्तान ने खुद को सार्वजनिक तौर पर एक निष्पक्ष पक्ष और संभावित मध्यस्थ के रूप में पेश किया। लेकिन अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि पर्दे के पीछे पाकिस्तान ने ईरानी विमानों को अपने एयरबेस पर पार्क करने की अनुमति दी, ताकि वे संभावित अमेरिकी हवाई हमलों से सुरक्षित रह सकें।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान ने अपनी कुछ संवेदनशील सैन्य और निगरानी संपत्तियों को संघर्ष के दौरान सुरक्षित रखने के लिए पड़ोसी देशों में भेजा था। इनमें ईरानी वायुसेना का RC-130 विमान भी शामिल बताया गया है, जो टोही और खुफिया जानकारी जुटाने में इस्तेमाल होता है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इन विमानों को रावलपिंडी के पास स्थित पाकिस्तान एयरफोर्स के नूर खान एयरबेस पर भेजा गया था।
हालांकि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने मंगलवार को इस रिपोर्ट का औपचारिक खंडन कर दिया। मंत्रालय ने कहा कि जिन विमानों का जिक्र किया जा रहा है, वे ईरान और अमेरिका से जुड़े राजनयिक एवं प्रशासनिक अधिकारियों के परिवहन के लिए इस्तेमाल किए गए थे। पाकिस्तान ने स्पष्ट किया कि इन विमानों की कोई सैन्य भूमिका नहीं थी और रिपोर्ट को “भ्रामक अटकलों” पर आधारित बताया।
इसके बावजूद यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि पाकिस्तान पर पहले भी दोहरी नीति अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। पाकिस्तान के पूर्व आईएसआई प्रमुख जनरल हामिद गुल का पुराना बयान एक बार फिर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने कहा था कि “ISI ने अमेरिका की मदद से सोवियत संघ को हराया और फिर अमेरिका की मदद से अमेरिका को हराया।”
विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान लंबे समय से विभिन्न वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन साधने की नीति अपनाता रहा है। एक ओर वह अमेरिका के साथ रणनीतिक रिश्ते बनाए रखता है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय इस्लामी देशों और संगठनों के साथ भी अपने संबंध मजबूत रखने की कोशिश करता है।
सीबीसी की रिपोर्ट सामने आने के बाद अमेरिका में भी इस पर राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिली। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यदि यह रिपोर्ट सही साबित होती है तो अमेरिका को ईरान और अन्य पक्षों के बीच मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की भूमिका पर पुनर्विचार करना चाहिए।
भारत के रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ सुशांत सरीन ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी की। उन्होंने अफगानिस्तान में तालिबान के पूर्व राजदूत अब्दुस सलाम जैफ के पुराने बयान का हवाला देते हुए कहा कि पाकिस्तान पर लंबे समय से अलग-अलग पक्षों को साथ लेकर चलने और पर्दे के पीछे अलग रणनीति अपनाने के आरोप लगते रहे हैं।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि ईरान ने संघर्ष के दौरान कुछ विमान अफगानिस्तान में भी भेजे थे। हालांकि यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि उनमें सैन्य विमान शामिल थे या केवल नागरिक विमान। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि यह कदम ईरान द्वारा अपनी बची हुई सैन्य और विमानन संपत्तियों को सुरक्षित रखने की व्यापक रणनीति का हिस्सा था।
फिलहाल पाकिस्तान इन सभी आरोपों से इनकार कर रहा है, लेकिन रिपोर्ट ने क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा समीकरणों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। खासतौर पर ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बना हुआ है और अमेरिका, ईरान तथा पाकिस्तान के संबंधों पर दुनिया की नजर टिकी हुई है।
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