द देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट लंबे समय से इस सिद्धांत पर जोर देता रहा है कि “जमानत नियम है, जेल अपवाद”, ताकि आरोपियों को ट्रायल से पहले अनावश्यक रूप से लंबे समय तक जेल में न रहना पड़े। लेकिन हाल के कुछ मामलों में शीर्ष अदालत ने गंभीर अपराधों को देखते हुए इस सामान्य दृष्टिकोण से अलग रुख अपनाया है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक पॉक्सो (POCSO) मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा दी गई जमानत को रद्द कर दिया। जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने हाई कोर्ट के आदेश को “विकृत और अनुचित” करार देते हुए कहा कि जमानत देते समय अपराध की प्रकृति और उसकी गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल चार्जशीट दाखिल हो जाना ही जमानत देने का आधार नहीं हो सकता। जमानत पर विचार करते समय अदालत का दायित्व है कि वह अपराध की प्रकृति, उसकी गंभीरता और जांच के दौरान जुटाए गए साक्ष्यों का गहन मूल्यांकन करे।
पीठ ने कहा कि मौजूदा मामले में आरोप बेहद जघन्य हैं। आरोप है कि नाबालिग पीड़िता को हथियार दिखाकर और धमकाकर बार-बार यौन उत्पीड़न किया गया, साथ ही ब्लैकमेल करने के इरादे से उसकी रिकॉर्डिंग भी की गई। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के अपराध न सिर्फ पीड़िता के जीवन पर गहरा असर डालते हैं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना को भी झकझोरते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट ने जमानत देते समय पॉक्सो एक्ट की वैधानिक सख्ती और अपराध की गंभीरता पर पर्याप्त विचार नहीं किया, इसलिए ऐसे आदेशों में हस्तक्षेप जरूरी है।
इस मामले में आरोपी को पहले सेशन कोर्ट से जमानत नहीं मिली थी, लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अप्रैल 2025 में उसे राहत दे दी थी। इसके खिलाफ पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और यह भी आरोप लगाया कि जमानत पर छूटने के बाद आरोपी उसे धमका रहा है।
इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में उमर खालिद और शरजील इमाम को यूएपीए के तहत पहली नजर में साजिश का मामला बनता पाए जाने पर जमानत देने से इनकार किया था, जबकि कुछ अन्य आरोपियों को राहत दी गई थी।
इन हालिया फैसलों से संकेत मिलता है कि सुप्रीम कोर्ट अब यौन अपराधों और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों जैसे गंभीर मामलों में जमानत को लेकर अधिक सख्त और संतुलित रुख अपना रहा है।
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