सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट किया, “यदि अदालत अग्रिम जमानत याचिका खारिज करना चाहती है तो वह ऐसा कर सकती है, लेकिन यह कहना कि याचिकाकर्ता को अब सरेंडर करना चाहिए, अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।”
दरअसल, यह मामला झारखंड हाई कोर्ट के एक आदेश से जुड़ा है। हाई कोर्ट ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए उसे निचली अदालत में सरेंडर करने और नियमित जमानत के लिए आवेदन करने का निर्देश दिया था। आरोपी ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
मामले के अनुसार, आरोपी के खिलाफ भूमि विवाद से जुड़े प्रकरण में भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं—323 (जानबूझकर चोट पहुंचाना), 420 (धोखाधड़ी), 467 (मूल्यवान प्रतिभूति की जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी), 471 (जाली दस्तावेज का उपयोग) और 120बी व 34—के तहत मामला दर्ज है।
झारखंड हाई कोर्ट ने आरोपी की दूसरी अग्रिम जमानत याचिका इस आधार पर खारिज कर दी थी कि उसमें कोई नई परिस्थिति या ठोस आधार नहीं बताया गया। साथ ही, कोर्ट ने अपने पहले के आदेश का हवाला देते हुए आरोपी को सरेंडर करने का निर्देश भी दिया था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि ऐसा निर्देश देना अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। सर्वोच्च अदालत ने दोहराया कि अदालत के पास केवल अग्रिम जमानत याचिका पर फैसला देने का अधिकार है, न कि आरोपी को आत्मसमर्पण के लिए बाध्य करने का।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में ऐसे मामलों में निचली अदालतों और हाई कोर्ट के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक के रूप में देखी जा रही है।