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मैक्रों का भारत दौरा: राफेल से आगे बढ़कर ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नई साझेदारी

Published on: February 18, 2026
Macron's visit to India Rafale

द देवरिया न्यूज़,पेरिस/नई दिल्ली : फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों तीन दिवसीय भारत दौरे पर मुंबई पहुंच चुके हैं। इस यात्रा के दौरान भारत और फ्रांस के बीच 114 राफेल फाइटर जेट समेत कई बड़े रक्षा और आर्थिक समझौतों पर हस्ताक्षर होने की संभावना है। 2017 में सत्ता संभालने के बाद यह मैक्रों की चौथी भारत यात्रा है, जो मौजूदा वैश्विक तनावों के बीच खास महत्व रखती है।

यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यूरोप पर टैरिफ और ग्रीनलैंड को लेकर दबाव की राजनीति कर रहे हैं। मैक्रों सार्वजनिक रूप से ट्रंप की नीतियों की आलोचना कर चुके हैं। दूसरी ओर, भारत और अमेरिका के बीच लंबे टैरिफ विवाद के बाद हाल ही में व्यापार समझौता हुआ है। ऐसे माहौल में भारत-फ्रांस की नजदीकी को ‘रणनीतिक संतुलन’ के रूप में देखा जा रहा है।


राफेल डील: सिर्फ हथियार नहीं, कूटनीति का संकेत

रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ मैथ्यू ड्रोइन ने CSIS में अपने विश्लेषण में लिखा है कि राफेल समझौता महज हथियार खरीद नहीं, बल्कि “फाइटर जेट डिप्लोमेसी” है। उनके मुताबिक, भारत इस डील के जरिए रूस पर अपनी रक्षा निर्भरता कम करना चाहता है और फ्रांस एक भरोसेमंद, राजनीतिक रूप से स्थिर सप्लायर के रूप में उभरा है।

इस समझौते में तकनीक हस्तांतरण (टेक्नोलॉजी ट्रांसफर) का प्रावधान अहम है। राफेल विमानों का बड़ा हिस्सा भारत में निर्मित होगा और लगभग 50% तक स्वदेशी भागीदारी होगी। इससे भारत की घरेलू रक्षा क्षमता मजबूत होगी और किसी एक देश पर निर्भरता घटेगी।

भारत की ‘मल्टीपोलर वर्ल्ड’ रणनीति—जहां वह अमेरिका, रूस और यूरोप के बीच संतुलन साधता है—को भी इस डील से बल मिलेगा।


फ्रांस को क्या फायदा?

फ्रांस के इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड स्ट्रैटेजिक अफेयर्स के विशेषज्ञ गैस्पार्ड श्निट्ज़लर के अनुसार, राफेल निर्यात से फ्रांस को दो बड़े लाभ मिलते हैं—संप्रभुता (Sovereignty) और प्रभाव (Influence)।

रक्षा निर्यात से फ्रांस का औद्योगिक और तकनीकी आधार मजबूत होता है। केवल घरेलू ऑर्डर से इतनी बड़ी उत्पादन क्षमता बनाए रखना संभव नहीं है। निर्यात से उत्पादन बढ़ता है, जिससे प्रति यूनिट लागत घटती है और रक्षा उद्योग की दीर्घकालिक स्थिरता बनी रहती है।

साथ ही, हथियारों की बिक्री केवल व्यापारिक सौदा नहीं होती—यह रणनीतिक साझेदारी और राजनीतिक प्रभाव का माध्यम भी है। रक्षा सहयोग से दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक निर्भरता और भरोसा बनता है।


यूरोप की अमेरिकी निर्भरता और नई दिशा

पोलिटिको में लिखे एक विश्लेषण में जकोपो बारिगाज़ी ने बताया कि यूरोपीय देश भले ही उन्नत हथियार बना लें, लेकिन खुफिया जानकारी, लॉजिस्टिक्स, कम्युनिकेशन, रिफ्यूलिंग, स्पेस एसेट्स और कमांड-एंड-कंट्रोल जैसे क्षेत्रों में वे अब भी अमेरिका पर काफी निर्भर हैं।

यूरोप में ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की बहस तेज हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका पर निर्भरता कम करने के लिए यूरोप को रक्षा क्षेत्र में भारी निवेश करना होगा—संभवतः जीडीपी का 10% तक। लेकिन आत्मनिर्भरता सिर्फ ज्यादा हथियार बनाने से नहीं, बल्कि एकीकृत सैन्य क्षमता विकसित करने से आएगी।


भारत-फ्रांस साझेदारी का व्यापक अर्थ

भारत और फ्रांस की राफेल डील दोनों देशों के दीर्घकालिक लक्ष्यों को साधती है। भारत को रक्षा क्षेत्र में विविधता और तकनीकी मजबूती मिलती है, जबकि फ्रांस को एशिया में एक मजबूत रणनीतिक साझेदार और स्थायी रक्षा बाजार।

वैश्विक शक्ति संतुलन के इस दौर में मैक्रों का भारत दौरा केवल एक रक्षा सौदा नहीं, बल्कि बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों में नई धुरी के निर्माण का संकेत माना जा रहा है।



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