द देवरिया न्यूज़,बीजिंग/वॉशिंगटन : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का हालिया चीन दौरा वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ गया है। कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ इसे बहुध्रुवीय दुनिया (Multipolar World) की ओर बढ़ते कदम के रूप में देख रहे हैं, जबकि कुछ इसे अमेरिका की वैश्विक पकड़ कमजोर होने के संकेत मान रहे हैं। इस यात्रा ने एक बात स्पष्ट कर दी कि चीन अब खुद को अमेरिका के बराबर की ताकत के रूप में पेश कर रहा है।
ट्रंप बीजिंग कई अहम मुद्दों—व्यापार, तकनीक, ईरान, होर्मुज स्ट्रेट और निवेश सहयोग—को लेकर पहुंचे थे, लेकिन अधिकांश मामलों में उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली। ट्रंप ने अपने समर्थकों को संदेश देने के लिए दावा किया कि चीन 200 बोइंग विमान खरीदने पर सहमत हो गया है, हालांकि चीनी पक्ष ने बाद में इस दावे को खारिज कर दिया।
‘थ्यूसीडाइड्स ट्रैप’ का जिक्र क्यों अहम?
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बैठक के दौरान “थ्यूसीडाइड्स ट्रैप” का उल्लेख किया, जिसने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा। यह प्राचीन यूनानी सिद्धांत बताता है कि जब कोई उभरती शक्ति स्थापित महाशक्ति को चुनौती देती है, तो संघर्ष की संभावना बढ़ जाती है।
शी जिनपिंग ने कहा कि दुनिया किसी स्थायी “थ्यूसीडाइड्स ट्रैप” की कैदी नहीं है। इसे इस संकेत के तौर पर देखा जा रहा है कि चीन खुद को एक ऐसी उभरती महाशक्ति मानता है जिसे रोका नहीं जा सकता।
क्या अमेरिका की वैश्विक पकड़ कमजोर पड़ रही?
विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका चीन पर अपेक्षित दबाव बनाने में सफल नहीं हो पाया है। हालांकि चीन भी आर्थिक चुनौतियों, कमजोर वैश्विक मांग और सप्लाई चेन समस्याओं से जूझ रहा है, लेकिन आने वाले दशकों में वह वैश्विक शक्ति संतुलन में और मजबूत भूमिका निभा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुताबिक, 2050 तक चीन की आबादी घटकर 1.31 अरब रह सकती है, जबकि भारत की आबादी लगभग 1.5 अरब के आसपास स्थिर बनी रहेगी। यही वजह है कि भारत को आने वाले समय में दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में गिना जा रहा है।
भारत और यूरोप के लिए नई चुनौती
ट्रंप प्रशासन के रवैये ने यूरोप और भारत दोनों को सतर्क किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के सहयोगियों के प्रति बदलते व्यवहार ने नई रणनीतिक समीकरणों की जरूरत पैदा की है। यूरोप अब अपनी रक्षा और आर्थिक रणनीति को ज्यादा स्वतंत्र बनाने की दिशा में बढ़ रहा है।
भारत और यूरोप के बीच तेजी से बढ़ता व्यापारिक और रणनीतिक सहयोग इसी बदलते वैश्विक माहौल का हिस्सा माना जा रहा है।
भारत के सामने क्या विकल्प?
भारत पिछले कुछ वर्षों में कोविड महामारी, यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट, अमेरिकी टैरिफ और होर्मुज स्ट्रेट जैसे बड़े वैश्विक संकटों से प्रभावित हुआ है। ऐसे में विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को दीर्घकालिक रणनीति पर ध्यान देना होगा।
विश्लेषकों के अनुसार, भारत को:
- गुटनिरपेक्ष संतुलन बनाए रखना,
- चीन की चुनौतियों पर नजर रखना,
- अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता से बचना,
- और अपनी अर्थव्यवस्था व तकनीकी क्षमता मजबूत करने पर फोकस करना होगा।
वैश्विक शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है और आने वाले दशकों में भारत की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है।
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