रिपोर्ट्स के मुताबिक, गोर ने अपने दौरे के दौरान मालदीव के विदेश और रक्षा मंत्रियों से मुलाकात की, लेकिन राष्ट्रपति मुइज्जू से मुलाकात नहीं हो सकी। बैठक रद्द होने के बाद अमेरिकी पक्ष ने कूटनीतिक माध्यमों से इस फैसले पर पुनर्विचार का आग्रह भी किया। इसके जवाब में मुइज्जू कार्यालय की ओर से बंद दरवाजों के पीछे एक ‘सीक्रेट मीटिंग’ का प्रस्ताव दिया गया, जिसे सर्जियो गोर ने ठुकरा दिया। इसके बाद वे बिना राष्ट्रपति से मिले ही माले से दिल्ली लौट आए।
अब इस घटनाक्रम के पीछे की वजह सामने आई है। बताया जा रहा है कि मुइज्जू ने यह कदम पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव, खासकर ईरान-अमेरिका-इजरायल के बीच हालिया टकराव को देखते हुए उठाया। रिपोर्ट्स के अनुसार, मुइज्जू खुद को ईरान के खिलाफ खड़े किसी भी पक्ष के साथ सार्वजनिक रूप से जोड़कर नहीं दिखाना चाहते थे। चूंकि सर्जियो गोर को पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का करीबी माना जाता है, ऐसे में मुइज्जू ने उनसे दूरी बनाए रखना ही उचित समझा।
मालदीव के राष्ट्रपति ने हाल के दिनों में इजरायल के प्रति भी आलोचनात्मक रुख अपनाया है और खुद को उसके विरोधी के रूप में पेश किया है। ऐसे में अमेरिका और इजरायल से जुड़े किसी भी प्रतिनिधि के साथ सार्वजनिक मुलाकात उनके राजनीतिक संदेश के विपरीत जा सकती थी।
हालांकि, इस फैसले को लेकर दोनों देशों की ओर से आधिकारिक तौर पर कोई बयान नहीं दिया गया है, लेकिन कूटनीतिक हलकों में इसे एक महत्वपूर्ण संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। यह कदम मालदीव की विदेश नीति में संतुलन साधने की कोशिश को भी दर्शाता है, जहां वह विभिन्न वैश्विक शक्तियों के बीच अपनी स्थिति सावधानी से तय कर रहा है।
दूसरी ओर, राष्ट्रपति मुइज्जू घरेलू राजनीति में भी दबाव का सामना कर रहे हैं। हाल ही में हुए नगरपालिका चुनावों में उनकी पार्टी पीपल्स नेशनल कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है, जो आमतौर पर सत्ताधारी दल के लिए असामान्य माना जाता है। इसके अलावा, राष्ट्रपति और संसदीय चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव को भी जनता ने जनमत संग्रह में खारिज कर दिया, जिसमें करीब 60 प्रतिशत लोगों ने विरोध में वोट दिया।
आर्थिक मोर्चे पर भी मालदीव की स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। देश इस समय आर्थिक संकट से जूझ रहा है और उसने भारत से लिए गए 400 मिलियन डॉलर के कर्ज को दो से तीन साल तक आगे बढ़ाने का अनुरोध किया है।
कुल मिलाकर, अमेरिकी राजदूत से मुलाकात रद्द करने का फैसला सिर्फ एक कूटनीतिक घटना नहीं, बल्कि मालदीव की बदलती विदेश नीति, क्षेत्रीय तनाव और घरेलू दबावों का संयुक्त परिणाम माना जा रहा है।