यह संयंत्र राजधानी ढाका से करीब 160 किलोमीटर दूर पाबना जिले में स्थित है और इसका निर्माण रूस की सरकारी परमाणु एजेंसी रोसाटॉम द्वारा किया गया है। परियोजना की कुल क्षमता 2.4 गीगावाट (GW) है और इसके जरिए बांग्लादेश अपनी कुल बिजली जरूरतों का लगभग 10 से 12 प्रतिशत हिस्सा पूरा करने का लक्ष्य रखता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, फिलहाल इस प्लांट की पहली यूनिट में ईंधन भराई की शुरुआत की गई है, जो कमीशनिंग प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। इस चरण के बाद रिएक्टर को नियंत्रित तरीके से चालू किया जाएगा और धीरे-धीरे बिजली उत्पादन शुरू होगा। अधिकारियों का कहना है कि शुरुआत में उत्पादन कम स्तर पर रहेगा, जबकि 2027 तक इसके पूरी क्षमता से काम करने की उम्मीद है।
बांग्लादेश सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री फकीर महबूब अनम ने इस परियोजना को देश के लिए “मील का पत्थर” बताया है। उन्होंने कहा कि रूपपुर परमाणु संयंत्र न केवल देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि औद्योगिक विकास को गति देने और तकनीक-आधारित अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाएगा।
इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 13 अरब डॉलर है, जिसमें से लगभग 90 प्रतिशत वित्तीय सहायता रूस द्वारा सरकारी ऋण के रूप में दी जा रही है। यह निवेश बांग्लादेश के ऊर्जा ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संयंत्र के चालू होने के बाद बांग्लादेश की आयातित बिजली पर निर्भरता कुछ हद तक कम हो सकती है। हालांकि, पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने में अभी समय लगेगा।
इस बीच, भारत भी इसी VVER तकनीक पर आगे बढ़ रहा है। तमिलनाडु के कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र में पहले से ही दो VVER-1000 रिएक्टर काम कर रहे हैं और भविष्य में वहां VVER-1200 तकनीक पर आधारित नई यूनिटें जोड़ने की योजना है। कुल मिलाकर, रूपपुर परियोजना बांग्लादेश के लिए ऊर्जा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक पहल है, जो उसे स्थायी और आधुनिक ऊर्जा स्रोतों की दिशा में आगे बढ़ाने में मदद करेगी।