द देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा की उस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रही संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी थी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद निर्णय सुरक्षित रखा।
जस्टिस वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ लूथरा ने पैरवी की, जबकि केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान रोहतगी और लूथरा ने संसदीय पैनल के गठन की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि जजेस (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत किसी जज को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार केवल लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा चेयरमैन को है।
वहीं, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने संसदीय समिति के गठन का बचाव करते हुए कहा कि जब प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार हो जाता है, तो स्पीकर और चेयरमैन मिलकर जांच समिति का गठन कर सकते हैं।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में कहा था कि जजेस (इन्क्वायरी) एक्ट के तहत लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को जस्टिस वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए समिति गठित करने से रोका नहीं जा सकता, भले ही राज्यसभा में ऐसा ही प्रस्ताव खारिज कर दिया गया हो।
गौरतलब है कि 14 मार्च 2025 को जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर जले हुए करेंसी नोटों के बंडल मिलने का मामला सामने आया था। इसके बाद उनका तबादला दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने 16 दिसंबर को इस मामले में जस्टिस वर्मा की याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताते हुए लोकसभा स्पीकर कार्यालय और संसद के दोनों सदनों के सचिव जनरल को नोटिस जारी किए थे।
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