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सुप्रीम कोर्ट ने लॉ छात्रों की अनिवार्य उपस्थिति पर जताई सख्ती, कहा- हॉस्टल सिर्फ ‘बोर्डिंग-लॉजिंग’ बन जाएंगे

Published on: May 16, 2026
Supreme Court made mandatory for law students
द  देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने कानून के छात्रों की अनिवार्य उपस्थिति (अटेंडेंस) से जुड़े मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के 2025 के फैसले पर गंभीर चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर अटेंडेंस की अनिवार्यता खत्म कर दी गई, तो नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी और लॉ कॉलेजों के हॉस्टल केवल रहने-खाने की जगह बनकर रह जाएंगे।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एक शिक्षण संस्थान की याचिका पर सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किया। यह याचिका दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देते हुए दायर की गई है, जिसमें कहा गया था कि केवल कम उपस्थिति के आधार पर कानून के छात्रों को परीक्षा देने से नहीं रोका जा सकता।
सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने टिप्पणी की कि छात्रों का नियमित रूप से कक्षाओं में जाना बेहद जरूरी है और इस मुद्दे पर अदालत सही कानूनी स्थिति स्पष्ट करेगी। उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट के फैसले का असर यह हो सकता है कि लॉ यूनिवर्सिटी के हॉस्टल महज “बोर्डिंग और लॉजिंग” सेंटर बन जाएं।
जस्टिस मेहता ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट संभवतः एक छात्र की आत्महत्या की घटना से प्रभावित नजर आता है। दरअसल, यह मामला 2016 में कानून के छात्र सुशांत रोहिल्ला की आत्महत्या से जुड़ा है। आरोप था कि कम उपस्थिति के कारण उसे परीक्षा में बैठने से रोका गया था, जिससे वह मानसिक दबाव में था।
इसी घटना के संदर्भ में नवंबर 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि किसी भी कानून के छात्र को सिर्फ 75 प्रतिशत से कम उपस्थिति के आधार पर परीक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता।
हाई कोर्ट ने कॉलेजों को निर्देश दिया था कि वे कम उपस्थिति वाले छात्रों के लिए अतिरिक्त कक्षाएं, असाइनमेंट और कानूनी सहायता गतिविधियां आयोजित करें। इसके बावजूद यदि उपस्थिति कम रहती है, तो छात्रों को परीक्षा से रोकने के बजाय अधिकतम 5 प्रतिशत अंक काटे जा सकते हैं।
इसके अलावा, अदालत ने कॉलेजों को यह भी निर्देश दिया था कि वे छात्रों की अटेंडेंस का साप्ताहिक अपडेट जारी करें और हर महीने छात्रों व अभिभावकों को नोटिस भेजें।

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