पाकिस्तान में हुई शुरुआती वार्ता बेनतीजा रहने के बाद पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी नेवी को होर्मुज और ईरानी पोर्ट्स के आसपास सक्रिय रहने और नाकेबंदी लागू करने का निर्देश दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने की एक सोची-समझी रणनीति है।
तक्षशिला संस्थान के रिसर्च एनालिस्ट अभिषेक कडियाला के अनुसार, यह नाकेबंदी ट्रंप का “सबसे सटीक दांव” है। उनका कहना है कि इससे ईरान की तेल सप्लाई बाधित होती है, जो उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। साथ ही, यह कदम अमेरिका को सीधे सैन्य कार्रवाई के लिए कांग्रेस की मंजूरी लेने की जटिल प्रक्रिया से भी आंशिक राहत देता है।
दरअसल, अमेरिका और इजरायल द्वारा कई हफ्तों तक किए गए हमलों के बावजूद ईरान पर वैसा दबाव नहीं बन पाया, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। ईरान की भौगोलिक स्थिति, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य पर उसकी पकड़, उसे रणनीतिक बढ़त देती है। ऐसे में अमेरिका की नाकेबंदी उस बढ़त को संतुलित करने की कोशिश मानी जा रही है।
हालांकि, ट्रंप प्रशासन ने युद्धविराम को आगे बढ़ाया है, लेकिन नाकेबंदी जारी रखी है। इसे बातचीत में ईरान पर दबाव बनाने के एक प्रभावी हथियार के रूप में देखा जा रहा है। यह रणनीति अमेरिका को आर्थिक और सैन्य दोनों स्तरों पर बढ़त देने की कोशिश करती है।
कानूनी रूप से भी यह कदम अहम है। ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ (IEEPA) और पहले से लागू प्रतिबंध कानूनों के तहत अमेरिकी प्रशासन को आपातकालीन स्थितियों में कार्रवाई का अधिकार मिलता है। ईरान के खिलाफ 1979 से लागू राष्ट्रीय आपातकाल इस कार्रवाई को और मजबूती देता है।
आंकड़ों के अनुसार, ईरान का लगभग 90 प्रतिशत व्यापार होर्मुज के रास्ते होता है। नाकेबंदी के कारण उसे प्रतिदिन सैकड़ों मिलियन डॉलर का नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसका असर खाद्य सामग्री, दवाइयों और मशीनरी के आयात पर भी पड़ेगा, जिससे देश में महंगाई और असंतोष बढ़ सकता है।
हालांकि, इस रणनीति में जोखिम भी कम नहीं हैं। ईरान की संभावित जवाबी कार्रवाई, क्षेत्रीय तनाव का बढ़ना और कूटनीतिक बातचीत के टूटने का खतरा लगातार बना हुआ है। बावजूद इसके, फिलहाल होर्मुज में जारी यह नाकेबंदी इस संघर्ष का सबसे निर्णायक पहलू बनती जा रही है।