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बिहार विधानसभा चुनाव 2025: सत्ता की चाबी फिर छोटे दलों के हाथ में, बढ़ी भूमिका से बड़ी पार्टियों की बढ़ी चिंता

Published on: November 13, 2025
Bihar Assembly Election 2025

द देवरिया न्यूज़ : बिहार की राजनीति में एक बार फिर वही पुराना समीकरण आकार लेता दिख रहा है — सत्ता की चाबी उन दलों के पास होगी, जिनके पास सीटें भले कम हों, लेकिन सामाजिक आधार ठोस है। इस बार भी छोटे दल अपने प्रभाव के दम पर चुनावी तस्वीर तय करने की स्थिति में पहुंचते दिख रहे हैं।

छोटे दलों ने 2020 में बदली थी बाजी

2020 के विधानसभा चुनाव में NDA को 125 और महागठबंधन को 110 सीटें मिली थीं। फर्क बेहद मामूली था, लेकिन NDA की जीत में छोटे दलों की बड़ी भूमिका रही थी।
मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (VIP) और जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) ने चार-चार सीटें जीतकर सत्ता संतुलन तय किया था। दूसरी ओर, महागठबंधन में वाम दलों — CPI(ML) (12 सीटें), CPI और CPM (दो-दो सीटें) — ने शानदार प्रदर्शन कर RJD को मजबूती दी थी।

वोट प्रतिशत में भी दिखा प्रभाव

2020 के आंकड़ों के अनुसार RJD को 23.5%, BJP को 19.8%, कांग्रेस को 9.4% और वाम दलों को 4.7% वोट मिले थे। यानी करीब 57% वोट इन चार दलों को मिले, जबकि बाकी 43% वोट छोटे दलों और निर्दलीयों के खाते में गए। यही 43% वोट सत्ता का समीकरण तय करने में निर्णायक साबित हुए थे।

NDA में नए समीकरण

इस बार NDA में चिराग पासवान की LJP (रामविलास) की वापसी ने नया उत्साह भरा है। पिछली बार अलग चुनाव लड़कर चिराग ने JDU को भारी नुकसान पहुंचाया था। अब उन्हें 29 सीटें दी गई हैं।
इसके साथ ही उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) को 6 सीटें मिली हैं। दूसरी ओर, BJP और JDU दोनों को अपनी सीटों में कटौती करनी पड़ी है — BJP 9 और JDU 14 कम सीटों पर चुनाव लड़ेगी।

महागठबंधन में नए दांव-पेंच

महागठबंधन में मुकेश सहनी ने NDA का साथ छोड़ अब RJD-कांग्रेस गठबंधन का रुख किया है। सहनी की VIP को 15 सीटें मिली हैं। साथ ही वाम दलों को भी पिछली बार से ज्यादा सीटें दी गई हैं।
हालांकि कांग्रेस और RJD दोनों की सीटों में हल्की कटौती हुई है — कांग्रेस 9 सीटें और RJD 1 सीट कम पर चुनाव लड़ेगी।

नई ताकतें मैदान में

इस चुनाव में प्रशांत किशोर (PK) की जन सुराज पार्टी पहली बार गंभीरता से मैदान में है। उन्होंने गांव-गांव पदयात्रा कर युवाओं और ग्रामीण तबकों में पकड़ बनाने की कोशिश की है।
इसी तरह आम आदमी पार्टी (AAP) भी सीमित असर के साथ अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही है। वहीं असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM पहले ही सीमांचल में मजबूत उपस्थिति दर्ज करा चुकी है — 2020 में उसने 5 सीटें जीती थीं।

निर्णायक भूमिका में छोटे दल

बिहार का चुनावी गणित हमेशा से जातीय संतुलन पर आधारित रहा है।

  • VIP — निषाद समुदाय पर प्रभाव

  • HAM — दलित-महादलित वोट बैंक

  • LJP (R) — पासवान मतदाता

  • RLM — पिछड़ी जातियों का नेटवर्क

  • CPI(ML) — ग्रामीण मजदूर वर्ग का भरोसा

इन सामाजिक समीकरणों ने छोटे दलों को “किंगमेकर” बना दिया है। अगर चुनाव परिणाम एक बार फिर करीबी मुकाबले में रहे, तो सरकार की चाबी इन्हीं के हाथों में होगी।


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