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तवांग की दिवाली: जब शांति, श्रद्धा और मक्खन के दीयों से जगमगाता है सीमांत भारत

Published on: October 17, 2025
Tawang's Diwali When

द देवरिया न्यूज़ : अरुणाचल प्रदेश का सीमांत जिला तवांग इन दिनों अनोखी और आध्यात्मिक रोशनी से नहाया हुआ है। देश के अन्य हिस्सों में जहां दिवाली का अर्थ है—आतिशबाजी, रोशनी और उल्लास, वहीं तवांग में यह पर्व शांति, प्रार्थना और ज्ञान का प्रतीक है। यहां के लोग इसे बटर लैंप फेस्टिवल के रूप में मनाते हैं, जिसमें मक्खन के दीयों और प्रार्थनाओं से पूरा इलाका आलोकित हो उठता है।

शोर नहीं, शांति की दिवाली

तवांग में बसे मोनपा जनजाति के लोग और बौद्ध अनुयायी अपने घरों, मठों और गलियों को मक्खन से बने दीयों से सजाते हैं। लकड़ी के बने पारंपरिक लैंटर्न और जड़ी-बूटियों से तैयार हर्बल पटाखे इस पर्व को पर्यावरण के अनुकूल बनाते हैं।
स्थानीय धर्मगुरु रिंचेन लामा कहते हैं, “हमारे लिए दिवाली का अर्थ प्रकाश से अधिक आत्मिक शांति है। यह त्योहार सद्भाव और सामाजिक मेलजोल का प्रतीक बन चुका है।”

तवांग दीपोत्सव: आस्था और पर्यटन का संगम

दिवाली के बाद तवांग में मनाया जाने वाला तवांग दीपोत्सव अब राज्य सरकार के वार्षिक तवांग महोत्सव का अहम हिस्सा बन चुका है। इस साल यह आयोजन 27 से 31 अक्तूबर तक होगा, जिसमें देश-विदेश से हजारों पर्यटक शामिल होंगे।
साढ़े ग्यारह हजार फीट की ऊंचाई पर बसे तवांग की पहाड़ियां जब मक्खन के दीयों से चमक उठती हैं, तो लगता है मानो श्रद्धा और शांति खुद धरती पर उतर आई हो।

सम्राट अशोक से जुड़ी मान्यता

यह त्योहार बौद्ध परंपरा का मूल हिस्सा नहीं है, लेकिन बौद्ध लामा इसे सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म अपनाने की स्मृति में भी मनाते हैं। उनके अनुयायी इस दिन विशेष प्रार्थना करते हैं और दीयों के माध्यम से अज्ञान के अंधकार को मिटाने का प्रतीकात्मक संदेश देते हैं।

मोनपा संस्कृति का स्वाद

दिवाली पर यहां सिर्फ दीये ही नहीं, बल्कि स्थानीय स्वाद भी खास होता है। तवांग में पारंपरिक भारतीय मिठाइयों के साथ मोनपा व्यंजन जैसे जाउ (चावल से बना मीठा पकवान), थुपका और मोमो परोसे जाते हैं।
मिठाइयों में लड्डू, बर्फी और गुझिया स्थानीय अंदाज में तैयार की जाती हैं, जिनमें पहाड़ी दूध और मक्खन का स्वाद होता है।

तवांग मठ में विशेष प्रार्थना

शहर से लगभग दो किलोमीटर दूर स्थित तवांग मठ, एशिया का दूसरा सबसे बड़ा और सबसे पुराना बौद्ध मठ है। दिवाली के अवसर पर यहां विशेष प्रार्थना और दीप प्रज्वलन का आयोजन किया जाता है। स्थानीय निवासी और पर्यटक दोनों इसमें भाग लेते हैं।
पूर्व शिक्षक टी.एन. गामलिंग बताते हैं, “दिवाली के समय तवांग मठ के भीतर की रोशनी और बाहर की ठंडी हवा का संगम ऐसा अनुभव देता है, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।”

शांति और प्रकृति का पर्व

तवांग की दिवाली एक संदेश देती है—उत्सव सिर्फ रोशनी और आतिशबाजी का नहीं, बल्कि आत्मिक जागृति और प्रकृति के प्रति सम्मान का भी हो सकता है। यहां के लोग न तो तेज़ रोशनी का शोर मचाते हैं, न ही पटाखों से प्रदूषण फैलाते हैं, बल्कि बटर लैंप जलाकर भीतर और बाहर दोनों जगत को प्रकाशित करते हैं।

जब पूरे देश में आतिशबाजी से आकाश गूंजता है, उसी समय तवांग की पहाड़ियों पर शांति की यह रोशनी जलती है—जो शायद भारत की सबसे सुंदर दिवाली है।


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