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संसद में दिल्ली-एनसीआर प्रदूषण पर हंगामा, सरकार बोली—AQI और फेफड़ों की बीमारियों के बीच सीधा सबूत नहीं

Published on: December 20, 2025
Delhi-NCR pollution in Parliament

द देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान तीखी बहस देखने को मिली। राज्यसभा में सरकार के एक जवाब के बाद यह मुद्दा राजनीतिक विवाद का रूप ले बैठा। सरकार ने सदन को बताया कि एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) के स्तर में वृद्धि और फेफड़ों की गंभीर बीमारियों के बीच सीधा और निर्णायक वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, हालांकि यह स्वीकार किया गया कि वायु प्रदूषण श्वसन संबंधी बीमारियों को बढ़ाने वाला एक अहम कारक जरूर है।

यह जवाब भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद लक्ष्मीकांत वाजपेयी द्वारा पूछे गए प्रश्न के लिखित उत्तर में दिया गया। सांसद ने सरकार से जानना चाहा था कि क्या वह इस तथ्य से अवगत है कि दिल्ली-एनसीआर में खराब AQI के कारण लोगों की फेफड़ों की क्षमता कम हो रही है और फेफड़ों में फाइब्रोसिस जैसी गंभीर बीमारियां बढ़ रही हैं, जैसा कि विभिन्न रिपोर्टों में दावा किया गया है। साथ ही उन्होंने पूछा था कि इन बीमारियों से लोगों को बचाने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है।

सरकार का पक्ष: ठोस डेटा का अभाव

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने राज्यसभा को दिए जवाब में कहा कि फिलहाल ऐसा कोई ठोस और निर्णायक डेटा उपलब्ध नहीं है, जिससे यह साबित किया जा सके कि मौतें या गंभीर बीमारियां केवल और सीधे तौर पर वायु प्रदूषण के कारण होती हैं। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य कई कारकों पर निर्भर करता है, जिनमें खान-पान, जीवनशैली, काम करने की परिस्थितियां, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, पहले से मौजूद बीमारियां, रोग प्रतिरोधक क्षमता और आनुवंशिक कारण शामिल हैं। स्वास्थ्य को केवल पर्यावरणीय कारणों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।

हालांकि, सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि वायु प्रदूषण सांस से जुड़ी बीमारियों और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ाने वाला एक प्रमुख जोखिम कारक है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

वायु प्रदूषण से निपटने के लिए उठाए जा रहे कदम

सरकार ने सदन को यह भी बताया कि वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों से निपटने के लिए कई स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं। इसके तहत प्रोग्राम मैनेजर, मेडिकल ऑफिसर, नर्स, आशा कार्यकर्ता और ट्रैफिक पुलिस जैसे फ्रंटलाइन वर्कर्स के लिए विशेष प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार किए गए हैं, ताकि वे प्रदूषण से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान और प्रबंधन कर सकें।

इसके अलावा, आम जनता को जागरूक करने के लिए अंग्रेजी, हिंदी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में सूचना सामग्री विकसित की गई है। नेशनल प्रोग्राम ऑन क्लाइमेट चेंज एंड ह्यूमन हेल्थ (NPCCHH) के तहत बच्चों, महिलाओं और कामकाजी आबादी के लिए अलग-अलग जागरूकता सामग्री भी तैयार की गई है, ताकि संवेदनशील वर्गों को प्रदूषण के प्रभावों से बचाया जा सके।

सरकार के इस जवाब के बाद विपक्ष ने इसे प्रदूषण के खतरे को कमतर आंकने की कोशिश बताया, जबकि सरकार का कहना है कि वह वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर ही अपनी बात रख रही है और वायु प्रदूषण से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति पर काम कर रही है।


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