द देवरिया न्यूज़,वॉशिंगटन : आधुनिक युद्ध में ड्रोन तकनीक ने पूरी रणनीति बदल दी है। अब युद्ध केवल ताकतवर और महंगे हथियारों का नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में इस्तेमाल होने वाले सस्ते ड्रोन का भी बन चुका है। रूस के पूर्व नेता जोसेफ स्टालिन का एक पुराना कथन—“क्वांटिटी की अपनी एक अलग क्वालिटी होती है”—आज ड्रोन वॉरफेयर में पूरी तरह फिट बैठता दिखाई दे रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अब युद्ध में “ड्रोन स्वार्म” यानी एक साथ सैकड़ों छोटे और सस्ते ड्रोन से हमला करना नई रणनीति बन चुका है। कई बार कुछ सौ डॉलर के ड्रोन करोड़ों के सैन्य हथियार और सिस्टम को नष्ट कर देते हैं। ऐसे ड्रोन यदि मार गिराए भी जाएं, तो नुकसान अपेक्षाकृत कम माना जाता है।
अब तक अमेरिका की रणनीति अत्याधुनिक, महंगे और बेहद सटीक हथियारों पर आधारित रही है। हालांकि सीमित अभियानों में ये हथियार प्रभावी साबित हुए, लेकिन लंबे युद्ध में इनकी लागत बेहद भारी पड़ने लगी है। इसका उदाहरण पैट्रियट मिसाइल डिफेंस सिस्टम है, जिसका एक इंटरसेप्टर करीब 40 लाख डॉलर का होता है। इसके बावजूद अमेरिका को ईरानी शाहेद ड्रोन जैसे 20 से 35 हजार डॉलर कीमत वाले ड्रोन को मार गिराने के लिए इसका इस्तेमाल करना पड़ा।
इसी अनुभव के बाद अमेरिका अब कम लागत वाले हथियारों की ओर तेजी से बढ़ रहा है। पेंटागन ने अगले तीन वर्षों में 10 हजार से अधिक सस्ती क्रूज मिसाइलें खरीदने की योजना बनाई है। साथ ही अमेरिकी वायुसेना अपने महंगे MQ-9 Reaper ड्रोन का विकल्प तलाश रही है।
MQ-9 Reaper ड्रोन की कीमत प्रति यूनिट 35 मिलियन डॉलर से अधिक है। लेकिन हाल के वर्षों में ये ड्रोन युद्ध में लगातार निशाना बने हैं। ईरान और यमन जैसे देशों ने भी इन्हें मार गिराया है। ईरान युद्ध के दौरान 24 MQ-9 रीपर ड्रोन नष्ट होने से अमेरिका को 800 मिलियन डॉलर से अधिक का नुकसान हुआ था। हूती विद्रोहियों ने भी यमन में कई रीपर ड्रोन गिराए थे।
पेंटागन ने Anduril, CoAspire, Leidos और Zone 5 जैसी कंपनियों के साथ समझौते किए हैं। इनके तहत Low-Cost Containerized Missiles (LCCM) कार्यक्रम शुरू किया जाएगा। वहीं Castelion कंपनी के साथ सस्ते हाइपरसोनिक हथियारों के विकास पर काम होगा।
भारत भी MQ-9B प्रेडेटर ड्रोन डील का हिस्सा है। अक्टूबर 2024 में भारत और अमेरिका के बीच करीब 4 अरब डॉलर का समझौता अंतिम रूप ले चुका है। इसके तहत भारत कुल 31 MQ-9B ड्रोन खरीदेगा। इनमें 15 ड्रोन भारतीय नौसेना को, जबकि 8-8 ड्रोन थल सेना और वायुसेना को मिलेंगे।
समझौते के अनुसार इन ड्रोन की डिलीवरी जनवरी 2029 से शुरू होगी और 2030 तक पूरी की जाएगी। अमेरिकी कंपनी General Atomics भारत में इनके रखरखाव और असेंबली के लिए सुविधा केंद्र भी स्थापित करेगी।
हालांकि रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य के युद्ध में केवल महंगे ड्रोन पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के पास अत्याधुनिक एयर डिफेंस और रडार सिस्टम मौजूद हैं। ऐसे में MQ-9 जैसे बड़े ड्रोन शांतिकाल में निगरानी के लिए उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन युद्धकाल में उनकी उपयोगिता सीमित हो सकती है।
इसी वजह से भारत भी पिछले कुछ वर्षों में सस्ते, तेज और हमलावर ड्रोन विकसित करने पर तेजी से काम कर रहा है, ताकि भविष्य के युद्धों में तकनीकी और रणनीतिक बढ़त हासिल की जा सके।
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