क्या था मामला?
यह फैसला रौशनारा बेगम की याचिका पर आया, जिन्होंने अपने पूर्व पति से दहेज में मिले 7 लाख रुपये और 30 ग्राम सोने की वापसी के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।
रौशनारा का निकाह 2005 में हुआ था और 2011 में तलाक हो गया था।
हाईकोर्ट ने खारिज किया था दावा
निकाह के समय रौशनारा के पिता ने दामाद को 7 लाख रुपये और 30 ग्राम सोना दिया था, जिसकी जानकारी निकाह रजिस्टर में दर्ज थी।
हालांकि, कलकत्ता हाईकोर्ट ने काजी और महिला के पिता के बयानों में असंगति बताकर यह दावा खारिज कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए कहा कि निकाह में मिले पैसे और गहने महिला की सुरक्षा, गरिमा और समानता से जुड़े हैं। कोर्ट ने एक्ट की व्याख्या महिला की संवैधानिक गरिमा और समानता के अधिकार के आधार पर की।
कोर्ट ने आदेश दिया कि:
महिला के पूर्व पति को 7 लाख रुपये और 30 ग्राम सोने का मूल्य सीधे रौशनारा के बैंक खाते में जमा करना होगा।
ऐसा न करने पर 9% वार्षिक ब्याज देना होगा।
भुगतान के बाद पति को कोर्ट में हलफनामा दायर करना होगा।
कोर्ट का संवैधानिक संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत का संविधान बराबरी और न्याय के लिए उम्मीद का प्रतीक है, हालांकि यह लक्ष्य अभी पूरी तरह हासिल नहीं हुआ है।
कोर्ट ने कहा कि 1986 का कानून मुस्लिम महिला की इज्जत, वित्तीय सुरक्षा और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बनाया गया है, जो संविधान के आर्टिकल 21 के अनुरूप है।
महिलाओं के अधिकार सर्वोपरि
अदालत ने कहा कि कानून को बनाते और लागू करते समय महिलाओं के अनुभव, गरिमा और अधिकारों को सबसे ऊपर रखा जाना चाहिए, ताकि उन्हें तलाक के बाद भी न्याय और सुरक्षा मिल सके।