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वृंदावन में वैष्णव भक्ति और जैन तपस्या का संगम, प्रेमानंद जी महाराज से मिले विश्व शांति यात्रा पर निकले जैन मुनि

Published on: January 5, 2026
Vaishnava devotion and Jain asceticism in Vrindavan
द देवरिया न्यूज़,वृंदावन। धर्मनगरी वृंदावन की पावन धरा पर हाल ही में एक दुर्लभ और हृदयस्पर्शी दृश्य देखने को मिला, जब भारत से लंदन तक 25 हजार किलोमीटर की विश्व शांति पदयात्रा पर निकले जैन मुनियों के दल ने श्री केलि कुंज पहुंचकर विख्यात संत श्री प्रेमानंद जी महाराज से भेंट की। यह मुलाकात केवल दो धर्मों के संतों का मिलन नहीं, बल्कि वैष्णव भक्ति और जैन धर्म की कठोर तपस्या का अद्भुत आध्यात्मिक संगम रही।
विश्व शांति और अहिंसा के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से निकले जैन मुनियों ने वृंदावन पहुंचकर प्रेमानंद जी महाराज से आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त किया। संवाद के दौरान महाराज जी ने जैन धर्म की कठोर साधना, ब्रह्मचर्य और इंद्रिय संयम की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि बिना संयम और तप के ईश्वर मार्ग की प्राप्ति संभव नहीं है।
इस अवसर पर प्रसिद्ध जैन संत हंसरत्न सूरीश्वर जी महाराज की तपस्या का भी उल्लेख हुआ, जिन्होंने महीनों तक केवल जल ग्रहण कर उपवास का विश्व रिकॉर्ड बनाया है। प्रेमानंद जी महाराज ने कहा कि ऐसी कठिन साधना केवल ईश्वरीय कृपा और प्रबल आत्मबल से ही संभव हो पाती है।
जब जैन साध्वियों ने मन की चंचलता को लेकर प्रश्न किया, तो महाराज जी ने सरल शब्दों में समाधान देते हुए कहा कि मन का स्वभाव भटकना है, लेकिन निरंतर नाम-जप और आत्म-चिंतन से इसे वश में किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि चाहे मार्ग अहिंसा और तप का हो या प्रेम और भक्ति का, अंतिम लक्ष्य अहंकार का विसर्जन ही है।
मुलाकात के अंत में प्रेमानंद जी महाराज ने समाज के लिए एक गहरा संदेश देते हुए कहा कि जो अपने भीतर के विकार—काम, क्रोध और लोभ—पर विजय पा ले, वही सच्चा साधक है। वेश और परंपराएं भले अलग हों, लेकिन सत्य और आत्मकल्याण का स्वरूप एक ही है।
यह भेंट समाज के लिए एक प्रेरक उदाहरण बनी, जहां जैन संतों ने महाराज जी के राधा नाम के प्रति समर्पण को सराहा, वहीं प्रेमानंद जी महाराज ने जैन मुनियों को समाज का “प्रकाश स्तंभ” बताया।

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