प्रियंका चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व ट्विटर) पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि भारत में बलात्कार पीड़ितों को न्याय की एक झलक पाने के लिए भी वर्षों तक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि यह देश की एक कड़वी सच्चाई है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने न्यायिक व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए कहा कि सजा की दर काफी कम है और कई मामलों में पुलिस की जांच कमजोर होती है। इसके साथ ही उन्होंने अदालतों में फैसलों में होने वाली देरी पर भी चिंता जताई। उनका कहना था कि लंबी सुनवाई के बाद जब “संदेह का लाभ” देकर आरोपियों को बरी कर दिया जाता है, तो इससे पीड़ितों को न्याय मिलने की उम्मीद कमजोर पड़ जाती है।
सरकारों पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि त्वरित न्याय की बातें अक्सर तब की जाती हैं, जब किसी घटना को लेकर जनाक्रोश बढ़ जाता है। उनके अनुसार, यह रवैया चिंताजनक है और न्याय प्रणाली में सुधार की जरूरत को दर्शाता है।
हाल ही में दिल्ली की तीस हजारी अदालत द्वारा एक युवक को छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न के मामले में बरी किए जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह के फैसले कई सवाल खड़े करते हैं। अदालत ने अपने निर्णय में कहा था कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा, जिसके चलते आरोपी को बरी किया गया।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध करने के लिए “संदेह से परे” प्रमाण आवश्यक होता है, जो न्याय प्रणाली का एक मूल सिद्धांत है। हालांकि, इस पर लगातार बहस होती रही है कि जांच और साक्ष्य संग्रह की प्रक्रिया को और मजबूत कैसे बनाया जाए, ताकि पीड़ितों को समयबद्ध और प्रभावी न्याय मिल सके।
इस मुद्दे ने एक बार फिर देश में न्यायिक सुधार, पुलिस जांच की गुणवत्ता और पीड़ितों के अधिकारों को लेकर बहस को तेज कर दिया है।