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दिल्ली में प्रदूषण से निजात के लिए 8–10 लाख करोड़ की जरूरत, सरकार ने मानी लंबी लड़ाई की चुनौती

Published on: December 28, 2025
Freedom from pollution in Delhi

द देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली : राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है और इससे निपटने के लिए अब तक किए गए उपाय नाकाफी साबित हो रहे हैं। दिल्ली सरकार ने भी संकेत दिए हैं कि यह समस्या अल्पकालिक नहीं है और इसके स्थायी समाधान के लिए भारी निवेश की जरूरत पड़ेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली में प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण पाने के लिए करीब 8 से 10 लाख करोड़ रुपये तक का खर्च आ सकता है। सरकारी फंड के साथ-साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी के बिना इतना बड़ा बदलाव संभव नहीं दिखता।

चरणबद्ध योजना की जरूरत

दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए एक समग्र और चरणबद्ध योजना पर काम करना होगा। इसके तहत सड़कों का पुनर्निर्माण कर उन्हें पूरी तरह पक्का करना, धूल नियंत्रण के पुख्ता इंतजाम, इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करना और सार्वजनिक परिवहन को बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक बनाना शामिल है। इसके साथ ही केवल उच्च गुणवत्ता वाले ईंधन और सख्त उत्सर्जन मानकों वाले वाहनों के उपयोग को बढ़ावा देना होगा, जिसके लिए सरकारी सब्सिडी और प्रोत्साहन आवश्यक होंगे।

उद्योगों, खासकर छोटे प्रतिष्ठानों को भी नई और स्वच्छ तकनीकों को अपनाने के लिए मार्गदर्शन और सहयोग की जरूरत है। विशेषज्ञों के अनुसार, कई एजेंसियों की भागीदारी के कारण रसद और क्रियान्वयन से जुड़ी चुनौतियां भी सामने आती हैं, जिन्हें दूर करना जरूरी है।

CAQM की भूमिका और सीमाएं

वायु प्रदूषण की गंभीरता को देखते हुए वर्ष 2020 में केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के इलाकों के लिए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) की स्थापना की थी। बाद में संसद ने इसे कानूनी समर्थन दिया। यह आयोग दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में वायु प्रदूषण से जुड़ी कार्य योजनाओं के समन्वय में अहम भूमिका निभा रहा है।

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि CAQM के पास अभी पर्याप्त अधिकार, प्रशिक्षित कर्मियों और मजबूत कार्यान्वयन तंत्र की कमी है। इसके अलावा, जनस्मृति भी एक बड़ी चुनौती है। दिल्ली-एनसीआर साल भर प्रदूषण की चपेट में रहता है, लेकिन सर्दियों में हालात बिगड़ते ही अस्थायी कदम उठाए जाते हैं—नई समितियों का गठन, अदालती फटकार और तात्कालिक फैसले—जो लंबे समय तक असरदार साबित नहीं होते।

एक पूर्व पर्यावरण सचिव के अनुसार, समस्या और उसके समाधान दोनों स्पष्ट हैं, जरूरत है तो सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति, पर्याप्त संसाधनों और निरंतर कार्रवाई की।


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