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ट्रंप की चीन नीति से कमजोर पड़ा क्वाड? नई दिल्ली बैठक के बीच उठे बड़े सवाल

Published on: May 27, 2026
Weakened by Trump's China policy

द  देवरिया न्यूज़,टोक्यो/नई दिल्ली : भारत की राजधानी नई दिल्ली में मंगलवार को क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की अहम बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्रियों ने हिस्सा लिया। करीब दो वर्षों के लंबे अंतराल के बाद हुई इस बैठक को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की रणनीतिक राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति के कारण क्वाड गठबंधन पहले जैसा प्रभावशाली नहीं रह गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। पहले जहां इंडो-पैसिफिक क्षेत्र अमेरिका की रणनीति का केंद्र माना जाता था, वहीं अब ट्रंप प्रशासन का फोकस पश्चिमी गोलार्ध और मध्य पूर्व की ओर अधिक दिखाई दे रहा है। इसका असर क्वाड की सक्रियता और रणनीतिक एकजुटता पर भी पड़ा है।

इंडो-पैसिफिक से मध्य पूर्व की ओर झुका अमेरिका

फरवरी में इजरायल और ईरान के बीच तनाव बढ़ने के बाद अमेरिका ने अपने कई सैन्य संसाधनों और नौसैनिक बेड़ों को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से हटाकर मध्य पूर्व में तैनात कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के खिलाफ चलाए गए अमेरिकी सैन्य अभियान “एपिक फ्यूरी” में अमेरिका ने अपने कई महत्वपूर्ण हथियारों का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल कर लिया।

इस घटनाक्रम ने एशिया में अमेरिका के सहयोगी देशों की चिंता बढ़ा दी। उन्हें आशंका होने लगी कि किसी बड़े क्षेत्रीय संघर्ष की स्थिति में अमेरिका पहले जैसी सैन्य सहायता देने की स्थिति में नहीं रहेगा।

बीजिंग स्थित राजनीतिक विश्लेषक आइनार टैंगेन ने कहा कि चीन के साथ संबंध सुधारने की ट्रंप की कोशिशों के बाद अमेरिका को अब अपने सहयोगियों को भरोसा दिलाना पड़ रहा है कि उसने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया है।

चीन के साथ ट्रंप की नजदीकी से बढ़ी चिंता

विश्लेषकों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने हाल के महीनों में चीन के साथ रिश्ते बेहतर करने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौतों और कूटनीतिक बातचीत में तेजी आई है। ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ संबंध मजबूत करने की सार्वजनिक कोशिशें भी की हैं।

यही वजह है कि क्वाड देशों के भीतर असहजता बढ़ी है। दरअसल, क्वाड गठबंधन को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव और आक्रामक रणनीति के जवाब के रूप में देखा जाता रहा है। ऐसे में यदि अमेरिका ही चीन के साथ नजदीकी बढ़ाता है तो इस समूह की रणनीतिक दिशा पर सवाल उठना स्वाभाविक माना जा रहा है।

जापानी विशेषज्ञों ने उठाए सवाल

जापान इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल अफेयर्स की वरिष्ठ विश्लेषक उमी अरिगा ने कहा कि नई दिल्ली में हुई बैठक “नुकसान को सीमित करने की कोशिश” जैसी लगती है। उन्होंने कहा कि क्वाड अब उस स्तर की राजनीतिक और रणनीतिक ऊर्जा नहीं दिखा पा रहा, जिसकी कभी उससे उम्मीद की जाती थी।

अरिगा के अनुसार, 2025 में अब तक क्वाड नेताओं का कोई बड़ा शिखर सम्मेलन नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि शीर्ष स्तर पर नेतृत्व की कमी और वाशिंगटन की बदलती प्राथमिकताओं ने इस समूह की रणनीतिक एकजुटता को कमजोर किया है।

उन्होंने यह भी कहा कि ट्रंप की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में क्वाड का केवल औपचारिक रूप से जिक्र किया गया, जबकि कुछ साल पहले तक इसे अमेरिका की एशिया नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था।

क्या क्वाड अपनी दिशा खो रहा है?

विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के वर्षों में क्वाड ने वैक्सीन, सप्लाई चेन, समुद्री सुरक्षा और महत्वपूर्ण तकनीकों जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया है, लेकिन यह सहयोग अब रणनीतिक स्तर पर कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है।

जापानी विश्लेषकों का मानना है कि सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि अमेरिका चीन के साथ समझौते और संतुलन की नीति अपनाता है, तो फिर क्वाड का मूल उद्देश्य कितना प्रभावी रह जाएगा।

हालांकि भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया अब भी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने के लिए क्वाड को जरूरी मंच मानते हैं। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बदलती वैश्विक राजनीति के बीच यह गठबंधन खुद को किस तरह पुनर्गठित करता है।


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