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UNSC चुनाव में जर्मनी की हार से भारत सतर्क, 2027 के चुनाव और स्थायी सदस्यता की रणनीति पर बढ़ी चर्चा

Published on: July 10, 2026
Germany's defeat in the UNSC election

द  देवरिया न्यूज़,न्यूयॉर्क : संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की गैर-स्थायी सदस्यता के लिए हाल ही में हुए चुनाव में जर्मनी की अप्रत्याशित हार ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह परिणाम भारत के लिए भी एक महत्वपूर्ण संकेत है, क्योंकि भारत 2028-29 कार्यकाल (यदि यही समयावधि लागू है) के लिए होने वाले आगामी चुनावों की तैयारी कर रहा है।

पहली बार चुनाव हारा जर्मनी

यूरोपीय समूह की दो गैर-स्थायी सीटों के लिए हुए चुनाव में पुर्तगाल और ऑस्ट्रिया विजयी रहे, जबकि जर्मनी को अपेक्षा से कम समर्थन मिला। रिपोर्टों के अनुसार, पुर्तगाल को 134 वोट, ऑस्ट्रिया को 131 वोट और जर्मनी को 104 वोट प्राप्त हुए। यह पहली बार है जब जर्मनी UNSC की गैर-स्थायी सीट का चुनाव हार गया।

क्या रही हार की वजह?

संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व स्थायी प्रतिनिधि टी.एस. तिरुमूर्ति ने एक लेख में जर्मनी की हार के पीछे कई कारण बताए हैं। उनके अनुसार, इजरायल के समर्थन में जर्मनी के स्पष्ट रुख और चीन तथा रूस के साथ उसके तनावपूर्ण संबंधों ने चुनावी समीकरणों को प्रभावित किया।

तिरुमूर्ति का मानना है कि 2019-20 में सुरक्षा परिषद में अपने कार्यकाल के दौरान जर्मनी ने चीन और रूस के खिलाफ मुखर रुख अपनाया था, जिसका असर इस चुनाव में देखने को मिला।

भारत के लिए क्यों अहम है यह परिणाम?

भारत आगामी वर्षों में सुरक्षा परिषद की गैर-स्थायी सदस्यता के लिए चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है। ऐसे में जर्मनी की हार को कई विशेषज्ञ भारत के लिए एक कूटनीतिक संकेत मान रहे हैं कि केवल वैश्विक प्रतिष्ठा पर्याप्त नहीं होती, बल्कि व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

G4 समूह पर भी उठे सवाल

भारत, जर्मनी, जापान और ब्राजील G4 समूह के सदस्य हैं, जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और स्थायी सदस्यता के विस्तार की मांग करता है।

हालांकि, प्रत्येक G4 सदस्य के क्षेत्रीय विरोधी भी हैं। भारत का पाकिस्तान, जापान का दक्षिण कोरिया, जर्मनी का इटली और ब्राजील का मेक्सिको लंबे समय से G4 के प्रस्तावों का विरोध करते रहे हैं। इसके अलावा सुरक्षा परिषद के कुछ स्थायी सदस्य भी परिषद के विस्तार को लेकर अलग-अलग रुख रखते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे हालात में भारत को अपनी कूटनीतिक रणनीति संतुलित रखते हुए व्यापक वैश्विक समर्थन बनाए रखने की जरूरत होगी।

UNSC सुधार की मांग क्यों तेज हो रही है?

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी व्यवस्था पर आधारित है। बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन को देखते हुए कई देश परिषद में सुधार और नए स्थायी सदस्यों को शामिल करने की मांग कर रहे हैं।

भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का प्रबल दावेदार रहा है। उसे ग्लोबल साउथ सहित कई देशों का समर्थन प्राप्त है। वर्ष 2017 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के चुनाव में भारतीय उम्मीदवार न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी की जीत को भी भारत की महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता माना जाता है।

भारत के सामने कूटनीतिक चुनौती

विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत को न केवल UNSC की गैर-स्थायी सदस्यता के चुनाव में व्यापक समर्थन जुटाना होगा, बल्कि सुरक्षा परिषद में सुधार और स्थायी सदस्यता के अपने अभियान को भी संतुलित एवं प्रभावी कूटनीति के साथ आगे बढ़ाना होगा।


इसे भी पढ़ें : तुर्की से CAATSA प्रतिबंध हटाने की तैयारी में ट्रंप, भारत के लिए भी बढ़ी राहत की उम्मीद


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