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ताजिकिस्तान के आयनी एयरबेस से भारत की चुपचाप वापसी: रूस-चीन के बढ़ते प्रभाव और नई भू-रणनीति के बीच बड़ा फैसला

Published on: November 28, 2025
Aini Air Base of Tajikistan

द देवरिया न्यूज़ : ताजिकिस्तान के साथ हुए द्विपक्षीय समझौते की अवधि समाप्त होने के बाद भारत ने चुपचाप वहां के आयनी एयरबेस से अपनी सैन्य मौजूदगी हटा ली है। यह ठिकाना भारत की विदेशी धरती पर मौजूद इकलौती सैन्य तैनाती थी। आयनी एयरबेस, जिसे गिसार मिलिट्री एयरोड्रोम भी कहा जाता है, कभी सोवियत संघ का अहम सैन्य ठिकाना हुआ करता था। 1991 के बाद रूस इसके संचालन का खर्च नहीं उठा पा रहा था, जिसके बाद रूस के भरोसेमंद साझेदार के रूप में भारत को इसे विकसित करने की अनुमति दी गई।

POK सीमा से बेहद करीब स्थित एयरबेस

भारत ने 1990 के दशक के आखिर में इस एयरबेस को विकसित करने की प्रक्रिया शुरू की थी। यह पाक-अधिकृत कश्मीर और चीन के शिनजियांग प्रांत से सटे वखान कॉरिडोर से मात्र 20 किलोमीटर दूर स्थित है, जो इसे अत्यधिक सामरिक बना देता है। भारतीय वायुसेना और बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (BRO) ने लगभग 7 करोड़ डॉलर की लागत से 3,200 मीटर लंबा रनवे, एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम और फ्यूल डिपो का विकास किया।

कभी तैनात थीं भारतीय लड़ाकू विमान

इस एयरबेस पर कभी भारतीय वायुसेना के Su-30MKI फाइटर जेट और हेलिकॉप्टर भी तैनात रहे। इसके अतिरिक्त, भारत ने ताजिकिस्तान के फारखोर में एक सैन्य अस्पताल भी बनवाया था, जिसका उद्देश्य तालिबान के खिलाफ लड़ रहे नॉर्दर्न अलायंस के सदस्यों का इलाज करना और मध्य एशिया के इस क्षेत्र में भारत की सॉफ्ट पावर को प्रदर्शित करना था।
2021 में तालिबान के काबुल पर कब्जे के बाद यहां फंसे भारतीय नागरिकों को निकालने में भी इसी एयरबेस ने अहम भूमिका निभाई थी।

एयरबेस छोड़ने की वजह: रूस-चीन का बढ़ता प्रभाव

आयनी एयरबेस से भारत के हटने के पीछे ताजिकिस्तान पर चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव को बड़ी वजह माना जा रहा है। साथ ही, इस एयरबेस का प्रमुख उद्देश्य तालिबान के खिलाफ नॉर्दर्न अलायंस को मजबूत करना था, और अब तालिबान से भारत की बढ़ती कूटनीतिक निकटता भी इस फैसले का एक कारण हो सकती है। हालांकि, मध्य एशिया में भारत की भूमिका को लेकर रूस ने कभी आपत्ति नहीं जताई। उसने न केवल भारत के क्षेत्रीय प्रभाव को स्वीकारा बल्कि SCO की सदस्यता में भी उसका समर्थन किया।

चीन का तेज़ी से बढ़ता प्रभाव

दूसरी ओर, चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत मध्य एशिया में इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा परियोजनाओं में भारी निवेश किया है। ताजिकिस्तान के मुर्गोब जिले में चीन द्वारा सैन्य अड्डा स्थापित करना और SCO के माध्यम से सैन्य प्रभाव बढ़ाना इसी रणनीति का हिस्सा है। चीन इन देशों के साथ सैन्य अभ्यास, शस्त्र आपूर्ति और ट्रेनिंग देकर अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा है।

क्रिटिकल मिनरल्स की होड़ में बड़ा भू-रणनीतिक खेल

मध्य एशिया में वैश्विक ताकतों की दिलचस्पी बढ़ने का एक कारण यह भी है कि दुनिया अब क्रिटिकल मिनरल्स और ऊर्जा के नए स्रोत तलाशकर चीन पर निर्भरता कम करना चाहती है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर लगे पश्चिमी प्रतिबंधों ने इस क्षेत्र के देशों को भी अमेरिका, तुर्किये, यूरोपीय संघ, चीन और खाड़ी देशों के साथ अधिक संपर्क बढ़ाने पर मजबूर किया है।

अमेरिका की असंगत नीति का असर भारत पर

अमेरिका ने मध्य एशिया में अपनी नॉन-इंटरफेरेंस नीति में बदलाव जरूर किया है, लेकिन रणनीतिक स्पष्टता की कमी के चलते उसके कदम असंगत दिखते हैं। इसका असर भारत पर भी पड़ा। उदाहरण के लिए, ईरान के चाबहार पोर्ट को विकसित करने की भारत की परियोजना को अमेरिकी प्रतिबंधों ने बाधित किया, जबकि इससे मध्य एशियाई देशों से भारत की कनेक्टिविटी बढ़नी थी। बाद में अमेरिका ने छूट दी, पर तब तक परियोजना में लगे निवेशकों का भरोसा कमजोर हो चुका था।


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