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‘इस्लामिक NATO’ से पाकिस्तान को बड़ा फायदा? ब्रिटिश एक्सपर्ट बोले- भारत को उकसाने की कोशिश नाकाम

Published on: August 14, 2026
Pakistan and the 'Islamic NATO'

द  देवरिया न्यूज़,लंदन : पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुए ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ को लेकर पाकिस्तान में उत्साह है। इसे कई जगहों पर ‘इस्लामिक NATO’ के तौर पर पेश किया जा रहा है। हालांकि, ब्रिटेन के पूर्व मंत्री रोरी स्टीवर्ट और रणनीतिकार एलेस्टर कैंपबेल ने पाकिस्तान की उम्मीदों पर सवाल खड़े किए हैं।

ब्रिटिश विशेषज्ञों का कहना है कि इस समझौते के बाद पाकिस्तान को उम्मीद थी कि भारत तीखी प्रतिक्रिया देगा, लेकिन नई दिल्ली ने बेहद संयमित रुख अपनाया। उनके मुताबिक, सऊदी अरब भी भारत के साथ किसी संभावित सैन्य टकराव में घसीटे जाने में दिलचस्पी नहीं रखेगा।

भारत ने नहीं दी पाकिस्तान को मनमाफिक प्रतिक्रिया

ब्रिटिश रणनीतिकार एलेस्टर कैंपबेल ने एक इंटरव्यू में कहा कि मक्का समझौते के बाद पाकिस्तान जिस तरह की भारतीय प्रतिक्रिया चाहता था, वह उसे नहीं मिली। उनके मुताबिक, भारत ने स्थिति को भड़काने के बजाय संयमित प्रतिक्रिया दी। कैंपबेल के अनुसार, पाकिस्तान चाहता था कि भारत इस समझौते पर आक्रामक प्रतिक्रिया दे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाने की कोशिश को अपेक्षित सफलता नहीं मिली।

वहीं, ब्रिटेन के पूर्व मंत्री रोरी स्टीवर्ट ने कहा कि सऊदी अरब भारत के साथ किसी युद्ध में शामिल होना नहीं चाहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम एशिया में अलग-अलग देशों के बीच बन रहे गठबंधनों के बीच भारत की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

भारत ने कहा- राष्ट्रीय हितों की रक्षा करेंगे

मक्का रक्षा समझौते पर भारत ने भी फिलहाल संतुलित प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत समझौते के अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय शांति और स्थिरता पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और जरूरत पड़ने पर सभी आवश्यक कदम उठाएगा।

भारत और सऊदी अरब के बीच पहले से मजबूत रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं। दोनों देशों के बीच बड़े पैमाने पर व्यापार और निवेश संबंध हैं। ऐसे में नई दिल्ली ने पाकिस्तान की अपेक्षा के विपरीत सऊदी अरब को लेकर कोई तीखी टिप्पणी नहीं की।

पाकिस्तान ने समझौते को बताया ‘रक्षात्मक’

पाकिस्तान ने भी इस रक्षा समझौते को लेकर सफाई दी है। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा कि पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुआ समझौता ‘पूरी तरह रक्षात्मक प्रकृति’ का है। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य सदस्य देशों को संभावित सुरक्षा चुनौतियों और खतरों से मिलकर निपटने में सक्षम बनाना है। पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री इशाक डार ने भी कहा कि यह समझौता किसी एक देश को निशाना बनाकर नहीं किया गया है।

क्या है मक्का संयुक्त रक्षा समझौता?

पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने 7 अगस्त को मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। तीनों देशों के संयुक्त बयान के मुताबिक, समझौते का उद्देश्य किसी भी आक्रामक कार्रवाई के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करना है। समझौते में यह प्रावधान बताया गया है कि तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में इसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।

इसी प्रावधान के कारण इसे कई विश्लेषक NATO की सामूहिक रक्षा व्यवस्था से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि, इस समझौते की वास्तविक सैन्य और राजनीतिक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि संकट की स्थिति में तीनों देश किस तरह और किस सीमा तक एक-दूसरे की सैन्य मदद करते हैं।

पाकिस्तान के लिए चुनौती क्या?

पाकिस्तान इस समझौते को अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत होने के तौर पर देख रहा है, लेकिन ब्रिटिश विशेषज्ञों की टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि इसे भारत के खिलाफ किसी निश्चित सैन्य गठबंधन के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।

भारत ने भी फिलहाल संयमित रुख अपनाकर संकेत दिया है कि वह इस घटनाक्रम का आकलन अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय सुरक्षा के नजरिए से करेगा। ऐसे में मक्का समझौते के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह गठबंधन वास्तव में कितनी दूर तक प्रभावी होता है और क्या यह भारत-पाकिस्तान के किसी संभावित टकराव में लागू होगा।


इसे भी पढ़ें : भारत-पाकिस्तान तनाव पर पाकिस्तानी एक्सपर्ट का दावा, मोदी सरकार की नीति को ठहराया जिम्मेदार; बातचीत पर भी उठाए सवाल


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