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सिंधु जल संधि पर भारत-पाकिस्तान में फिर बढ़ा तनाव, जानिए भारत की नई रणनीति और पाकिस्तान की बड़ी चुनौती

Published on: July 28, 2026
India-Pakistan on the Indus Waters Treaty

द  देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली/इस्लामाबाद : सिंधु जल संधि (IWT) को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने संधि को स्थगित करने का फैसला लिया था। इसके बाद पाकिस्तान की ओर से लगातार तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से लेकर सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर तक कई नेताओं ने भारत के इस कदम को गंभीर कार्रवाई बताते हुए विरोध जताया है।

वहीं, जनरल असीम मुनीर की अध्यक्षता में हुई कोर कमांडरों की कॉन्फ्रेंस के बाद 6 जुलाई को जारी आधिकारिक बयान को भी भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के संदर्भ में देखा गया। पाकिस्तान की ओर से सिंधु जल संधि को लेकर लगातार बयानबाजी के बीच भारत अब अपने हिस्से के जल संसाधनों के अधिकतम उपयोग की दिशा में आगे बढ़ने पर जोर दे रहा है।

सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान पर भारत के क्या आरोप हैं?

भारत का आरोप रहा है कि सिंधु जल संधि लागू होने के बाद से पाकिस्तान ने पश्चिमी नदियों पर भारत की ओर से प्रस्तावित लगभग हर परियोजना पर आपत्ति जताई है। इन परियोजनाओं में जल भंडारण क्षमता, आकार और तकनीकी डिजाइन से जुड़े मुद्दे भी शामिल रहे हैं।

भारतीय अधिकारियों का तर्क है कि संधि में विवादों के समाधान के लिए बनाए गए प्रावधानों का इस्तेमाल समय के साथ भारतीय परियोजनाओं में देरी कराने के लिए किया जाने लगा। भारत का मानना है कि संधि के तहत उसे अपने हिस्से के पानी के उपयोग का अधिकार है और विकास परियोजनाओं को केवल आपत्तियों के आधार पर अनिश्चितकाल तक रोका नहीं जा सकता।

भारत ने पिछले कुछ समय से अपनी नीति को लेकर स्पष्ट संकेत देते हुए कहा है कि आतंकवाद और जल सहयोग एक साथ नहीं चल सकते। इसी संदर्भ में भारतीय पक्ष की ओर से यह संदेश भी दिया जाता रहा है कि ‘खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।’

भारत के सामने पानी को लेकर कौन सी चुनौतियां हैं?

भारत में कई क्षेत्रों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। ऐसे में उपलब्ध सतही जल संसाधनों का बेहतर और अधिक प्रभावी उपयोग राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गया है।

इसके अलावा, पिछले कई दशकों में जलवायु और हाइड्रोलॉजिकल परिस्थितियों में भी बदलाव आया है। भारत का तर्क है कि पूर्वी नदियों में पानी की उपलब्धता और पश्चिमी नदियों के प्रवाह में बदलाव को देखते हुए जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता है।

1960 में जब सिंधु जल संधि अस्तित्व में आई थी, उस समय बांध और जल प्रबंधन से जुड़ी कई आधुनिक तकनीकें आज की तरह विकसित नहीं थीं। वर्तमान समय में जलाशयों की सुरक्षा और टिकाऊ संचालन के लिए आधुनिक सेडिमेंट मैनेजमेंट, लो-लेवल आउटलेट, ड्रॉडाउन फ्लशिंग और गेटेड स्पिलवे जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। भारत का पक्ष है कि बदलती तकनीकी परिस्थितियों और जल प्रबंधन की नई जरूरतों को देखते हुए अपनी परियोजनाओं को आधुनिक तरीके से संचालित करना जरूरी है।

पाकिस्तान के सामने कितना बड़ा है जल संकट?

पाकिस्तान लंबे समय से पानी की कमी को लेकर चिंता जताता रहा है। हालांकि, उसके अपने सरकारी दस्तावेजों में जल प्रबंधन से जुड़ी कई गंभीर चुनौतियों का उल्लेख मिलता है।

रिपोर्टों के मुताबिक, पाकिस्तान में हर साल बड़ी मात्रा में पानी बिना उत्पादक उपयोग के समुद्र में चला जाता है। इसके अलावा, नहरों के जरिए पानी के परिवहन के दौरान भी काफी मात्रा में पानी बर्बाद होने की बात सामने आती रही है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, पाकिस्तान के जल संकट के पीछे केवल भारत से मिलने वाले पानी की मात्रा ही जिम्मेदार नहीं है। वहां पुराना सिंचाई ढांचा, नहरों से पानी का रिसाव, सीमित जल भंडारण क्षमता, सिंचाई व्यवस्था की कम दक्षता और जल संसाधनों के कमजोर प्रबंधन जैसी समस्याएं भी बड़ी चुनौती हैं। कृषि प्रधान पाकिस्तान के लिए यह स्थिति गंभीर है, क्योंकि पानी की बर्बादी और सिंचाई व्यवस्था की कम दक्षता का सीधा असर कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है।

भारत की नई रणनीति क्या है?

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत अब अपने हिस्से के पानी का अधिकतम उपयोग करने और पानी की बर्बादी को कम करने के लिए कई परियोजनाओं पर तेजी से काम कर रहा है।

भारत की प्रमुख प्राथमिकताओं में चिनाब नदी बेसिन में हाइड्रोपावर परियोजनाओं का विकास शामिल है। इन परियोजनाओं को भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण, बिजली ग्रिड की स्थिरता और जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रीय विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, जिन प्रमुख परियोजनाओं पर काम किया जा रहा है, उनमें 1,856 मेगावाट का सवालकोट हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट, 1,000 मेगावाट का पाकल दुल प्रोजेक्ट, 850 मेगावाट का रातले प्रोजेक्ट, 624 मेगावाट का किरू प्रोजेक्ट और 540 मेगावाट का क्वार प्रोजेक्ट शामिल हैं।

इसके अलावा रावी नदी की एक सहायक नदी पर प्रस्तावित उझ मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका उद्देश्य ऐसे पानी का बेहतर इस्तेमाल करना है, जो वर्तमान में बिना उपयोग के अंतरराष्ट्रीय सीमा पार चला जाता है। इस परियोजना से सिंचाई, पेयजल, बाढ़ नियंत्रण और बिजली उत्पादन में मदद मिलने की उम्मीद है।

पुराने जलाशयों को भी आधुनिक बनाने की तैयारी

भारत की रणनीति में केवल नई परियोजनाओं का निर्माण ही शामिल नहीं है, बल्कि मौजूदा जलविद्युत परियोजनाओं की क्षमता और टिकाऊपन बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है।

इसके तहत आधुनिक रिजर्वॉयर और सेडिमेंट मैनेजमेंट तकनीकों के इस्तेमाल की योजना है। जलाशयों में जमा तलछट को हटाने और जलाशयों की क्षमता बनाए रखने के लिए लो-लेवल आउटलेट और सेडिमेंट फ्लशिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। भारत का तर्क है कि इन तकनीकों के इस्तेमाल से मौजूदा परियोजनाओं की उम्र बढ़ाने के साथ-साथ उनकी कार्यक्षमता भी बेहतर की जा सकती है।

आगे क्या होगा?

सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद आने वाले दिनों में और गहरा सकता है। भारत अपने हिस्से के जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जबकि पाकिस्तान संधि में किसी भी बदलाव का लगातार विरोध कर रहा है।

एक तरफ भारत जलविद्युत, सिंचाई और जल भंडारण क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है, वहीं पाकिस्तान के सामने अपने पुराने जल प्रबंधन ढांचे को आधुनिक बनाने की चुनौती है। ऐसे में सिंधु जल संधि का भविष्य दोनों देशों के बीच कूटनीतिक और रणनीतिक संबंधों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


इसे भी पढ़ें : पाकिस्तान में बढ़ती भुखमरी पर UN रिपोर्ट से चिंता, सेना के भारी खर्च पर उठे सवाल; भारत में कुपोषण के आंकड़ों में सुधार


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