तीन छोटे छेदों से की गई सर्जरी
इतने बड़े फाइब्रॉइड को निकालने के लिए आमतौर पर पेट पर बड़ा चीरा लगाकर ओपन सर्जरी करनी पड़ सकती है। हालांकि, KGMU के डॉक्टरों ने इसके बजाय मिनिमली इनवेसिव लैप्रोस्कोपिक तकनीक का इस्तेमाल किया।
डॉ. निशा सिंह के नेतृत्व में डॉक्टरों की टीम ने पेट पर केवल तीन छोटे छेद किए। इसके जरिए विशेष उपकरणों की मदद से फाइब्रॉइड को बाहर निकाला गया। इस तरह मरीज को बड़े ऑपरेशन से होने वाली अतिरिक्त परेशानी और लंबे रिकवरी पीरियड से बचाने का प्रयास किया गया।
मॉर्सेलेशन तकनीक से निकाला गया बड़ा फाइब्रॉइड
सर्जरी के दौरान मॉर्सेलेशन तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इस प्रक्रिया में बड़े फाइब्रॉइड को छोटे हिस्सों में विभाजित कर छोटे चीरे के रास्ते बाहर निकाला जाता है। डॉक्टरों के लिए यह प्रक्रिया इसलिए चुनौतीपूर्ण थी क्योंकि फाइब्रॉइड का आकार काफी बड़ा था और गर्भाशय में एक से अधिक गांठें मौजूद थीं। डॉक्टरों के मुताबिक, ऐसे मामलों में लैप्रोस्कोपिक सर्जरी के लिए अत्याधुनिक उपकरणों के साथ अनुभवी और कुशल मेडिकल टीम की आवश्यकता होती है।
ओपन सर्जरी के जोखिम से बची मरीज
डॉ. निशा सिंह ने बताया कि इतने बड़े और जटिल फाइब्रॉइड की लैप्रोस्कोपिक सर्जरी तकनीकी रूप से काफी चुनौतीपूर्ण होती है। इसके लिए डॉक्टरों को विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है। आधुनिक तकनीक के कारण मरीज को बड़े चीरे वाली सर्जरी से बचाया जा सका। साथ ही, कम चीरे के कारण दर्द और रिकवरी से जुड़ी परेशानियां भी कम होने की उम्मीद रहती है। ऑपरेशन के बाद महिला की हालत सामान्य बताई गई है और वह तेजी से स्वस्थ हो रही है।
डॉक्टरों की टीम ने निभाई अहम भूमिका
इस सफल सर्जरी में डॉ. निशा सिंह के साथ डॉ. चंद्रिमा रे, डॉ. रितु सिंह, डॉ. डिंपल रानी और एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. धर्मराज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। KGMU के डॉक्टरों की यह उपलब्धि जटिल फाइब्रॉइड के इलाज में आधुनिक लैप्रोस्कोपिक तकनीक की संभावनाओं को दर्शाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, मरीज की स्थिति और फाइब्रॉइड के आकार व स्थान के आधार पर इलाज की तकनीक का चयन किया जाता है।