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सऊदी अरब और UAE के बीच तनाव घटने के संकेत, भारत के लिए क्यों है राहत की खबर? जानिए पूरी कहानी

Published on: July 26, 2026
Saudi Arabia and UAE

द  देवरिया न्यूज़,दुबई : सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच पिछले कुछ महीनों से जारी तनाव अब कम होता दिखाई दे रहा है। मंगलवार को दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारियों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लगभग एक जैसे संदेश साझा किए। इन संदेशों में दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों, साझा विरासत और नेतृत्व की समझदारी को रेखांकित किया गया।

दोनों देशों के अधिकारियों का यह कदम ऐसे समय में सामने आया है, जब सऊदी अरब और UAE के बीच यमन, सूडान, तेल नीति और क्षेत्रीय भू-राजनीति जैसे कई मुद्दों पर मतभेद सामने आते रहे हैं। दोनों खाड़ी शक्तियों के बीच तनाव का असर यमन, सूडान और लीबिया समेत कई देशों में देखने को मिला है। ऐसे में दोनों देशों के रिश्तों में सुधार की कोई भी संभावना भारत के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत के सऊदी अरब और UAE दोनों के साथ मजबूत रणनीतिक, आर्थिक और कारोबारी संबंध हैं।

सऊदी और UAE के अधिकारियों ने क्या कहा?

सऊदी अरब के मीडिया मंत्री सलमान अल-दोसारी और UAE नेशनल मीडिया अथॉरिटी के चेयरमैन अब्दुल्ला बिन मोहम्मद अल-हामेद ने रियाद के समयानुसार शाम करीब 7 बजे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपने संदेश साझा किए।

अल-हामेद ने अपने पोस्ट में UAE और सऊदी अरब के संबंधों को साझा इतिहास और दोनों देशों के लोगों के बीच गहरे भाईचारे का विस्तार बताया। उन्होंने कहा कि दोनों देश एक साझा भविष्य और नियति से जुड़े हुए हैं। वहीं, सलमान अल-दोसारी ने भी दोनों देशों के रिश्तों को साझा इतिहास, विरासत और दोनों देशों के समझदार नेतृत्व से जोड़ते हुए इसे मजबूत संबंध बताया।

दोनों अधिकारियों के संदेशों में मीडिया की भूमिका पर भी जोर दिया गया। उन्होंने कहा कि मीडिया को दोनों देशों के रिश्तों के सकारात्मक पहलुओं को सामने लाना चाहिए और ऐसे किसी भी कदम से बचना चाहिए, जिससे दोनों देशों के बीच संबंध कमजोर हों।

आखिर दोनों देशों के बीच तनाव क्यों बढ़ा था?

सऊदी अरब और UAE लंबे समय से खाड़ी क्षेत्र के करीबी सहयोगी रहे हैं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के रणनीतिक और आर्थिक हित कई मुद्दों पर अलग-अलग दिखाई देने लगे हैं। इनमें तेल उत्पादन नीति, क्षेत्रीय प्रभाव, यमन का युद्ध, सूडान का गृहयुद्ध और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर रणनीतिक प्रभाव जैसे मुद्दे शामिल हैं।

यमन को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद सबसे ज्यादा चर्चा में रहे हैं। सऊदी अरब यमन में अपने सुरक्षा हितों के आधार पर सक्रिय रहा है, जबकि UAE ने वहां अलग-अलग स्थानीय गुटों को समर्थन दिया है। पिछले साल के अंत में दोनों देशों के बीच मतभेद खुलकर सामने आने की खबरें भी आई थीं।

सऊदी अरब की ओर से UAE समर्थित यमनी लड़ाकों पर कार्रवाई किए जाने की खबरों के बाद तनाव और बढ़ गया था। सऊदी अरब ने UAE पर अबू धाबी समर्थित यमनी लड़ाकों को हथियार उपलब्ध कराने का आरोप लगाया था, हालांकि UAE ने इन आरोपों से इनकार किया था।

सूडान में भी आमने-सामने हैं दोनों देश

सऊदी अरब और UAE के बीच मतभेद सिर्फ यमन तक सीमित नहीं हैं। सूडान का गृहयुद्ध भी दोनों देशों की अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताओं को सामने लाता है। सऊदी अरब सूडानी सेना यानी SAF (Sudanese Armed Forces) के साथ संबंध बनाए हुए है, जबकि UAE पर रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (RSF) का समर्थन करने के आरोप लगते रहे हैं। UAE ने इन आरोपों से इनकार किया है। सूडान में जारी संघर्ष के कारण लाल सागर और अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र में रणनीतिक महत्व बढ़ गया है। ऐसे में इस क्षेत्र में प्रभाव को लेकर सऊदी अरब और UAE के हित कई बार एक-दूसरे से टकराते दिखाई देते हैं।

तेल नीति भी है मतभेद की बड़ी वजह

सऊदी अरब और UAE दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में शामिल हैं और दोनों OPEC+ समूह के सदस्य हैं। हालांकि, तेल उत्पादन को लेकर दोनों देशों की प्राथमिकताएं हमेशा एक जैसी नहीं रही हैं। सऊदी अरब अक्सर तेल की कीमतों को स्थिर रखने और बाजार में संतुलन बनाए रखने के लिए उत्पादन नियंत्रण का समर्थन करता रहा है। दूसरी ओर, UAE ने कई मौकों पर अपनी उत्पादन क्षमता का अधिक इस्तेमाल करने की इच्छा जताई है।

वैश्विक तेल बाजार में प्रभाव बनाए रखने और राजस्व बढ़ाने की कोशिश भी दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक कारण मानी जाती है।

समुद्री मार्गों और बंदरगाहों पर बढ़ता प्रभाव

लाल सागर, अदन की खाड़ी और अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र में रणनीतिक प्रभाव को लेकर भी दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा देखी जाती है। UAE ने पिछले वर्षों में अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र और लाल सागर के आसपास बंदरगाहों तथा लॉजिस्टिक सुविधाओं में निवेश किया है। सोमालीलैंड और इरिट्रिया जैसे क्षेत्रों में UAE की मौजूदगी ने भी क्षेत्रीय रणनीतिक समीकरणों को प्रभावित किया है।

सऊदी अरब के लिए लाल सागर बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसके पश्चिमी तट पर देश के कई महत्वपूर्ण बंदरगाह और आर्थिक परियोजनाएं स्थित हैं। ऐसे में इस क्षेत्र में UAE के बढ़ते प्रभाव को लेकर रियाद की अपनी रणनीतिक चिंताएं हो सकती हैं।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं दोनों देशों के रिश्ते?

सऊदी अरब और UAE दोनों ही भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण साझेदार हैं। भारत के इन दोनों देशों के साथ मजबूत व्यापारिक, ऊर्जा, निवेश और रणनीतिक संबंध हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर काफी हद तक निर्भर है। इसके अलावा लाखों भारतीय नागरिक सऊदी अरब और UAE में काम करते हैं और भारत को बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भेजते हैं।

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में UAE के साथ रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को मजबूत किया है। वहीं सऊदी अरब के साथ भी ऊर्जा, निवेश और सुरक्षा सहयोग लगातार बढ़ा है।

यदि सऊदी अरब और UAE के बीच तनाव कम होता है तो इससे पूरे खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता बढ़ने की उम्मीद की जा सकती है। इसका अप्रत्यक्ष फायदा भारत को भी मिल सकता है। खासकर ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा के लिहाज से क्षेत्रीय स्थिरता भारत के हित में है।

क्या सच में खत्म हो रहा है तनाव?

दोनों वरिष्ठ अधिकारियों के एक जैसे सोशल मीडिया संदेश निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत माने जा सकते हैं, लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि दोनों देशों के बीच सभी रणनीतिक मतभेद पूरी तरह खत्म हो गए हैं।

यमन, सूडान, तेल उत्पादन और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के हित अभी भी कई जगह अलग हो सकते हैं। हालांकि, साझा हितों और क्षेत्रीय स्थिरता की जरूरत दोनों देशों को अपने रिश्तों में संतुलन बनाए रखने के लिए प्रेरित कर सकती है।

फिलहाल, दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से रिश्तों की मजबूती पर दिया गया संदेश इस बात का संकेत जरूर है कि सऊदी अरब और UAE अपने मतभेदों को नियंत्रित करने और पुराने करीबी संबंधों को बनाए रखने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। भारत के लिए यह इसलिए सकारात्मक खबर है क्योंकि खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता और दोनों देशों के साथ मजबूत रिश्ते नई दिल्ली के आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए बेहद अहम हैं।


इसे भी पढ़ें : बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने दिया इस्तीफा, कार्यकाल पूरा होने से पहले छोड़ा पद; नए राष्ट्रपति को लेकर अटकलें तेज


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