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अंटार्कटिका से सऊदी अरब तक हिमखंड खींचने का सपना, 1977 में हुआ था अनोखा प्रयोग; जानें क्यों फेल हुई योजना

Published on: August 1, 2026
From Antarctica to Saudi Arabia

द  देवरिया न्यूज़,रियाद : अरब प्रायद्वीप में लगातार बढ़ती मीठे पानी की समस्या को दूर करने के लिए करीब पांच दशक पहले सऊदी अरब के राजकुमार मोहम्मद अल-फैसल ने एक बेहद अनोखी योजना पेश की थी। उनका विचार था कि अंटार्कटिका से विशाल हिमखंडों को समुद्र के रास्ते सऊदी अरब लाकर उनसे पीने योग्य पानी हासिल किया जा सकता है। सुनने में यह योजना किसी साइंस फिक्शन फिल्म जैसी लगती है, लेकिन इसे लेकर बाकायदा वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के बीच गंभीर चर्चा हुई थी।

इस विचार की व्यवहारिकता को परखने और वैज्ञानिकों को वास्तविक हिमखंड की बर्फ दिखाने के लिए 1977 में अमेरिका के आयोवा स्टेट यूनिवर्सिटी तक करीब एक टन वजनी बर्फ का विशाल टुकड़ा पहुंचाया गया था। इसे हेलीकॉप्टर, विमान और रेफ्रिजरेटेड ट्रक के जरिए हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर लाया गया और विश्वविद्यालय के विशेष ठंडे कमरे में सुरक्षित रखा गया।

सऊदी राजकुमार ने बनाया था खास प्लान

मोहम्मद अल-फैसल उस समय सऊदी अरब के डिसेलिनेशन कार्यक्रम की निगरानी कर रहे थे। समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाने की तकनीक से सऊदी अरब को पीने का पानी तो मिल रहा था, लेकिन इसमें भारी ऊर्जा और बुनियादी ढांचे की जरूरत पड़ती थी।

इसी समस्या के बीच अल-फैसल ने हिमखंडों को पानी के वैकल्पिक स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने की संभावना पर विचार किया। उन्होंने Iceberg Transport International नाम की कंपनी भी बनाई। प्रस्ताव था कि अंटार्कटिका से करीब 10 करोड़ टन वजन तक के विशाल हिमखंड को विशेष प्लास्टिक और सेलब्लॉथ से ढककर शक्तिशाली टगबोट्स की मदद से समुद्र के रास्ते सऊदी अरब तक लाया जाए।

1977 में जुटे 18 देशों के वैज्ञानिक

इस विचार पर चर्चा के लिए अक्टूबर 1977 में अमेरिका के एमेस शहर में First International Conference on Iceberg Utilization आयोजित की गई। इसमें 18 देशों के करीब 200 वैज्ञानिक और इंजीनियर शामिल हुए। आयोजकों की इच्छा थी कि सम्मेलन में पहुंचे विशेषज्ञ सिर्फ तस्वीरों और रिपोर्टों के आधार पर हिमखंडों का अध्ययन न करें, बल्कि वास्तविक ग्लेशियर बर्फ को भी देखें। इसके लिए अलास्का की पोर्टेज झील से लगभग 2,500 पाउंड यानी करीब 1,133 किलोग्राम वजन का बर्फ का टुकड़ा चुना गया।

हेलीकॉप्टर से विमान और फिर ट्रक से पहुंची बर्फ

करीब छह फीट चौड़े, पांच फीट लंबे और चार फीट ऊंचे इस बर्फ के टुकड़े को इंसुलेशन और सूखी बर्फ में पैक किया गया। इसके बाद हेलीकॉप्टर से उठाकर विमान के जरिए आयोवा पहुंचाया गया और वहां से रेफ्रिजरेटेड ट्रक में सम्मेलन स्थल तक ले जाया गया। इस पूरी प्रक्रिया पर करीब 8,500 अमेरिकी डॉलर खर्च हुए थे। उस समय के समाचार पत्रों ने इसे मजाकिया अंदाज में ‘दुनिया का सबसे महंगा बर्फ का टुकड़ा’ तक कहा था।

क्यों फेल हो गया हिमखंड लाने का सपना?

प्रयोग और सम्मेलन ने दुनियाभर का ध्यान जरूर खींचा, लेकिन अंटार्कटिका से सऊदी अरब तक विशाल हिमखंड पहुंचाने की योजना व्यावहारिक नहीं बन सकी।

वैज्ञानिकों ने आकलन किया कि हिमखंड को अंटार्कटिका से अरब प्रायद्वीप तक पहुंचाने में सबसे बड़ी चुनौती उसका पिघलना होगी। भूमध्य रेखा के आसपास गर्म समुद्री पानी के संपर्क में आने से हिमखंड का बड़ा हिस्सा रास्ते में ही पिघल सकता था। इसके अलावा इतने बड़े हिमखंड को समुद्र में नियंत्रित तरीके से खींचना, उसे टूटने और पिघलने से बचाना, भारी परिवहन लागत, समुद्री कानून और तकनीकी चुनौतियां भी बड़ी बाधाएं थीं।

आखिरकार यह महत्वाकांक्षी परियोजना जमीन पर नहीं उतर सकी। हालांकि, 1977 का यह प्रयोग आज भी इतिहास के उन अनोखे वैज्ञानिक प्रयासों में गिना जाता है, जिनमें दुनिया की पानी की समस्या का समाधान प्रकृति के विशाल हिमखंडों में तलाशने की कोशिश की गई थी।



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