द देवरिया न्यूज़,मोगादिशु : अफ्रीकी देश सोमालिया और पाकिस्तान के बीच रक्षा संबंध तेजी से मजबूत होते नजर आ रहे हैं। दोनों देशों ने 4 अगस्त को द्विपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत आतंकवाद विरोधी अभियानों, सैन्य प्रशिक्षण, अनुभव और विशेषज्ञता साझा करने तथा क्षमता निर्माण में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी है।
इसके अलावा सोमालिया ने पाकिस्तान के JF-17 लड़ाकू विमान में भी रुचि दिखाई है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब पाकिस्तान अपनी सैन्य और रणनीतिक पहुंच को हिंद महासागर और अफ्रीका के आसपास बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
रणनीतिक रूप से बेहद अहम है सोमालिया
सोमालिया हॉर्न ऑफ अफ्रीका में स्थित है और इसकी भौगोलिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। देश की समुद्री सीमा करीब 3,300 किलोमीटर से अधिक लंबी है। यह अदन की खाड़ी और हिंद महासागर के बीच स्थित है, जहां से एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्ग गुजरते हैं।
सोमालिया की स्थिति बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य और लाल सागर के करीब होने के कारण भी महत्वपूर्ण है। लाल सागर से गुजरने वाला समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार के लिए अहम है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी देश की सैन्य मौजूदगी का रणनीतिक महत्व बढ़ जाता है।
पाकिस्तान क्यों बढ़ा रहा है मौजूदगी?
पाकिस्तान पारंपरिक तौर पर हॉर्न ऑफ अफ्रीका में बड़ी सैन्य शक्ति नहीं रहा है। हालांकि, सोमालिया के साथ रक्षा समझौता इस क्षेत्र में उसकी भूमिका बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। पाकिस्तान के लिए सोमालिया के साथ संबंध बढ़ाने का एक फायदा यह भी हो सकता है कि उसे हिंद महासागर के पश्चिमी हिस्से और अफ्रीकी तट के करीब अपनी रणनीतिक मौजूदगी मजबूत करने का अवसर मिले। इस क्षेत्र में सऊदी अरब और तुर्की भी अपने प्रभाव का विस्तार कर रहे हैं।
सोमालिया को पाकिस्तान से क्या चाहिए?
सोमालिया लंबे समय से आतंकवाद, राजनीतिक अस्थिरता, समुद्री डकैती और सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में उसे अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए बाहरी सहयोग की जरूरत है। पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग के जरिए सोमालिया को आतंकवाद विरोधी अभियानों का अनुभव, सैन्य प्रशिक्षण और अपेक्षाकृत कम लागत वाले रक्षा उपकरण हासिल करने की उम्मीद है। JF-17 में उसकी दिलचस्पी भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
पाकिस्तान का सोमालिया से पुराना सैन्य संपर्क
सोमालिया में पाकिस्तान की सैन्य मौजूदगी पूरी तरह नई नहीं है। 1990 के दशक की शुरुआत में सोमालिया में संयुक्त राष्ट्र के अभियान के दौरान पाकिस्तानी सैनिकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1995 में मोगादिशु से अंतरराष्ट्रीय बलों की वापसी के दौरान पाकिस्तानी सैनिक अंतिम दलों में शामिल थे। इस पुराने सैन्य संपर्क को अब दोनों देश नए रक्षा सहयोग के जरिए आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
भारत के लिए क्यों अहम है यह घटनाक्रम?
सोमालिया-पाकिस्तान रक्षा समझौते का भारत पर सीधा सैन्य प्रभाव फिलहाल स्पष्ट नहीं है, लेकिन हिंद महासागर में रणनीतिक दृष्टि से यह घटनाक्रम नई दिल्ली के लिए महत्वपूर्ण जरूर है। सोमालिया की भौगोलिक स्थिति भारत के पश्चिमी समुद्री क्षेत्र के व्यापक रणनीतिक परिवेश से जुड़ी हुई है। यदि पाकिस्तान भविष्य में सोमालिया में नियमित सैन्य प्रशिक्षण, नौसैनिक गतिविधियां या रक्षा सहयोग बढ़ाता है, तो पश्चिमी हिंद महासागर में उसकी गतिविधियों पर भारत को नजर रखनी पड़ सकती है।
खासकर बाब-अल-मंदेब, अदन की खाड़ी और लाल सागर के समुद्री मार्गों की सुरक्षा भारत के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन क्षेत्रों से भारत का बड़ा व्यापारिक आवागमन जुड़ा है। फिलहाल पाकिस्तान और सोमालिया के बीच हुआ समझौता मुख्य रूप से आतंकवाद विरोधी सहयोग, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर केंद्रित है। हालांकि, JF-17 में सोमालिया की संभावित रुचि और पाकिस्तान की क्षेत्रीय रणनीति आने वाले समय में इस रक्षा साझेदारी को और महत्वपूर्ण बना सकती है।
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