पेंटागन में स्पेस पॉलिसी के लिए असिस्टेंट सेक्रेटरी मार्क बेरकोविट्ज ने यह बात अमेरिकी सीनेट की आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के सामने कही। उन्होंने सुनवाई के दौरान बताया कि आज के समय में दुश्मन देश ‘नॉन-बैलिस्टिक खतरों’ पर तेजी से काम कर रहे हैं, जिनमें हाइपरसोनिक हथियार, लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलें और स्टील्थ ड्रोन शामिल हैं। ये ऐसे हथियार हैं, जिन्हें पहचानना और रोकना बेहद मुश्किल होता है।
मार्क बेरकोविट्ज ने साफ तौर पर कहा कि अमेरिका की मौजूदा मिसाइल डिफेंस प्रणाली सीमित है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में अमेरिका के पास जमीन आधारित एक सिंगल-लेयर डिफेंस सिस्टम है, जिसे मुख्य रूप से उत्तर कोरिया जैसे सीमित खतरे को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था। बड़े और अत्याधुनिक हमलों से निपटने के लिए यह पर्याप्त नहीं है।
उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका के पास पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलों के खिलाफ भी सीमित क्षमता है, जबकि हाइपरसोनिक हथियारों और आधुनिक क्रूज मिसाइलों के खिलाफ तो फिलहाल कोई प्रभावी डिफेंस सिस्टम मौजूद ही नहीं है। यह स्थिति अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती मानी जा रही है।
इसी चुनौती से निपटने के लिए अमेरिका ‘गोल्डन डोम’ नामक एक महत्वाकांक्षी मिसाइल डिफेंस प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। यह प्रोजेक्ट पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की परिकल्पना माना जाता है, जिसका उद्देश्य एक बहु-स्तरीय और अत्याधुनिक सुरक्षा कवच तैयार करना है।
इस परियोजना की अनुमानित लागत 175 से 185 बिलियन डॉलर के बीच बताई जा रही है। ‘गोल्डन डोम’ सिस्टम में जमीन, समुद्र, हवा और अंतरिक्ष—चारों स्तरों पर AI-आधारित कमांड सिस्टम और इंटरसेप्टर को एकीकृत किया जाएगा। इसके साथ ही इसमें काइनेटिक और नॉन-काइनेटिक तकनीकों के साथ स्पेस-बेस्ड सेंसर का उपयोग किया जाएगा, ताकि हर तरह के हवाई खतरों का समय रहते पता लगाया जा सके और उन्हें निष्क्रिय किया जा सके।
अमेरिकी स्पेस फोर्स के जनरल माइकल गुएटलीन के अनुसार, इस सिस्टम को 2028 तक ऑपरेशनल बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए शुरुआती चरण में 17 बिलियन डॉलर से अधिक की फंडिंग का प्रस्ताव भी रखा गया है, जबकि कुल लागत 2030 के दशक तक लगभग 185 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है।
कुल मिलाकर, अमेरिका की यह स्वीकारोक्ति बताती है कि वैश्विक स्तर पर हथियारों की दौड़ एक नए और अधिक जटिल दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां पारंपरिक रक्षा प्रणाली अब पर्याप्त नहीं रह गई हैं।