द देवरिया न्यूज़,तेहरान। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने अपनी मिसाइल रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए अधिक शक्तिशाली हमलों की तैयारी का संकेत दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान ने आधिकारिक तौर पर अपनी कुछ मिसाइलों में एक-एक टन तक के वॉरहेड लगाने की रणनीति अपनाई है। माना जा रहा है कि इससे हमलों की विनाशकारी क्षमता पहले की तुलना में काफी बढ़ सकती है।
ईरान की इस नई रणनीति की जानकारी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के एयरोस्पेस कमांडर जनरल मौसवी ने दी। उन्होंने बताया कि मिसाइलों में भारी वॉरहेड लगाने और सैचुरेशन अटैक रणनीति अपनाने का उद्देश्य दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को निष्क्रिय करना है।
खुफिया सूत्रों के हवाले से सामने आई रिपोर्ट के अनुसार, ईरान अब मिश्रित पेलोड वाली मिसाइलों के बजाय भारी वॉरहेड को मानक बनाने की दिशा में बढ़ रहा है। इस रणनीति का मकसद संभावित दुश्मन के ठिकानों पर अधिकतम नुकसान पहुंचाना बताया जा रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर किसी मिसाइल में एक टन तक का वॉरहेड लगाया जाता है और वह लक्ष्य पर गिरता है तो उसका विनाशकारी प्रभाव बेहद बड़ा हो सकता है। इससे मजबूत सैन्य ढांचे, एयरबेस, बंकर और लॉजिस्टिक हब जैसे ठिकानों को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
रिपोर्ट्स में यह भी कहा जा रहा है कि ईरान की यह रणनीति इजरायल के महत्वपूर्ण सैन्य ढांचे जैसे एयरबेस, कमांड सेंटर, बंदरगाह और हथियार डिपो को निशाना बनाने की क्षमता को बढ़ा सकती है। आम तौर पर कई बैलिस्टिक मिसाइलों में लगभग 500 किलोग्राम तक का वॉरहेड होता है, लेकिन एक टन का वॉरहेड इससे कहीं ज्यादा शक्तिशाली माना जाता है।
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि इतना भारी वॉरहेड कंक्रीट से बने मजबूत सैन्य ठिकानों को भी गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकता है। उदाहरण के तौर पर अगर ऐसी मिसाइल किसी एयरबेस पर गिरती है तो रनवे पर बड़ा गड्ढा बन सकता है, जिससे एयरबेस कई दिनों तक उपयोग के लायक नहीं रह सकता।
रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान की खोर्रमशहर-4 जैसी मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें भारी वॉरहेड ले जाने में सक्षम हैं। इसके साथ ही बड़ी संख्या में मिसाइलें एक साथ दागने की रणनीति भी अपनाई जा सकती है, जिसे “सैचुरेशन अटैक” कहा जाता है। इस रणनीति का उद्देश्य दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम—जैसे इजरायल का आयरन डोम, डेविड स्लिंग और एरो सिस्टम—पर दबाव बनाना होता है।
विश्लेषकों का कहना है कि यदि इस तरह की मिसाइलों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है तो इससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ सकता है। ऐसे हालात में जवाबी कार्रवाई की आशंका भी बढ़ जाती है, जिससे पूरे क्षेत्र में संघर्ष और गंभीर रूप ले सकता है।
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