एयर पावर एशिया की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) कार्यक्रम को 2024 में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी से प्रोटोटाइप विकास की मंजूरी मिल चुकी है। हालांकि इसे भारतीय वायुसेना में शामिल करने का लक्ष्य 2035 रखा गया है और विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें और देरी हो सकती है। ऐसे में भारत को तब तक के लिए किसी भरोसेमंद पांचवीं पीढ़ी के फाइटर की तलाश है।
Su-57 का भारत से पुराना रिश्ता
रूस का सुखोई Su-57 ‘फेलॉन’ हाल के एयर शो में अपनी उड़ान से खासा चर्चा में रहा है। यह विमान इंडो-रूस संयुक्त पांचवीं पीढ़ी के फाइटर एयरक्राफ्ट (FGFA) प्रोग्राम से विकसित हुआ था, जिस पर 2007 में समझौता हुआ था। हालांकि भारत 2018 में इस परियोजना से अलग हो गया। इसके बावजूद Su-57 का विकास जारी रहा और रूस ने इसका इस्तेमाल सबसे पहले 2018 में सीरिया और बाद में यूक्रेन में किया।
अब तक करीब 42 Su-57 विमान तैयार किए जा चुके हैं। यह एक अत्यधिक मैन्यूवरेबल फाइटर जेट है, जिसमें 360 डिग्री थ्रस्ट वेक्टरिंग की क्षमता है, जिससे यह जटिल हवाई युद्धाभ्यास कर सकता है।
आधुनिक तकनीक और हथियारों से लैस
Su-57 में इंटीग्रेटेड मॉड्यूलर एवियोनिक्स सिस्टम है, जो फाइबर-ऑप्टिक चैनलों पर आधारित है। इसमें नोज-माउंटेड N036 X-बैंड AESA रडार के साथ दो साइड-लुकिंग AESA रडार लगे हैं। इसके अलावा इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम, थर्मल इमेजर, नेविगेशन और टारगेटिंग पॉड जैसी आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं।
रूस इस विमान में लगातार नए हथियारों का एकीकरण कर रहा है। बिना क्रू वाले ‘ओखोटनिक’ UCAV को ‘लॉयल विंगमैन’ के तौर पर जोड़ने पर भी काम चल रहा है। Su-57 अपने आंतरिक हथियार बे में चार बियॉन्ड-विजुअल-रेंज R-37M मिसाइलें और साइड बे में दो शॉर्ट-रेंज R-74 मिसाइलें ले जा सकता है।
कीमत और उत्पादन भारत के लिए अहम
रिपोर्ट्स के अनुसार, Su-57 की प्रति विमान फ्लाईअवे लागत लगभग 35 मिलियन डॉलर है। यह कीमत इसे चीनी J-20 से काफी सस्ता और अमेरिकी F-35 से भी किफायती बनाती है। रूस का दावा है कि इसकी लाइफ-साइकिल लागत Su-27, Su-30 और Su-35 के बराबर है।
इन विमानों का निर्माण रूस के कोम्सोमोल्स्क-ऑन-अमूर एविएशन प्लांट में हो रहा है। उत्पादन में भी तेजी आई है—2022 में 6, 2023 में 12 और 2024 में 20 विमान डिलीवर किए गए हैं।
AMCA में देरी और अंतरिम जरूरत
भारत का AMCA एक स्टील्थ, मल्टीरोल, ट्विन-इंजन, एयर-सुपीरियरिटी फाइटर होगा, जिसमें ग्राउंड स्ट्राइक, SEAD और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर मिशन शामिल होंगे। इसकी शुरुआती विकास लागत करीब 15,000 करोड़ रुपये आंकी गई है। लेकिन इसके परिचालन में आने में अभी एक दशक से ज्यादा का समय लग सकता है।
चीन और पाकिस्तान की बढ़ती हवाई क्षमताओं के बीच भारत को तत्काल एक विश्वसनीय पांचवीं पीढ़ी के फाइटर की जरूरत है। रूस लंबे समय से भारत का भरोसेमंद रक्षा साझेदार रहा है। राफेल जैसे उन्नत विमानों के बावजूद भारत के पास अभी कोई पांचवीं पीढ़ी का जेट नहीं है। ऐसे में Su-57 को अंतरिम समाधान के तौर पर देखा जा रहा है, जो भारत की वायु शक्ति को जरूरी बढ़त दे सकता है।