ट्रंप ने कहा कि अमेरिका दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहा है। उन्होंने इसे एक सकारात्मक संकेत बताते हुए कहा कि दशकों बाद इजरायल और लेबनान के नेता एक साथ बैठने जा रहे हैं, जो क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है।
दरअसल, इजरायल और लेबनान के बीच औपचारिक कूटनीतिक संबंध नहीं हैं और दोनों देश लंबे समय से तनाव और टकराव की स्थिति में रहे हैं। आखिरी बार दोनों पक्षों के बीच उच्च-स्तरीय बातचीत 1993 में हुई थी। ऐसे में प्रस्तावित बैठक को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस बीच वॉशिंगटन में कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। हाल ही में इजरायल और लेबनान के राजदूतों के बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मध्यस्थता में बैठक हुई, जिसमें युद्धविराम की संभावनाओं पर चर्चा की गई। हालांकि, अब तक हिजबुल्लाह के साथ सीजफायर को लेकर कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इजरायल और लेबनान के बीच मुख्य विवाद सीमा से ज्यादा हिजबुल्लाह की भूमिका को लेकर है। ईरान समर्थित यह संगठन लेबनान में एक मजबूत सैन्य और राजनीतिक शक्ति है, जो सरकार से स्वतंत्र रूप से काम करता है। इजरायल लंबे समय से हिजबुल्लाह को अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानता रहा है।
हाल के दिनों में इजरायल द्वारा बेरूत और आसपास के इलाकों में हमलों में कुछ कमी देखी गई है, जिसे कूटनीतिक प्रयासों का असर माना जा रहा है। वहीं, लेबनान के नए नेतृत्व को लेकर भी उम्मीद जताई जा रही है कि वह हिजबुल्लाह के प्रभाव को सीमित करने की दिशा में कदम उठा सकता है।
हालांकि, जानकारों का यह भी कहना है कि इतनी जल्दी किसी व्यापक शांति समझौते की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी। फिलहाल यह बैठक भरोसा बहाल करने और कुछ बुनियादी मुद्दों पर सहमति बनाने की दिशा में शुरुआती कदम हो सकती है।
अगर यह वार्ता सफल रहती है, तो यह न केवल इजरायल-लेबनान संबंधों में नई शुरुआत होगी, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया में शांति प्रयासों को भी मजबूती मिल सकती है।