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नया चांदी’ बनता तांबा: सप्लाई संकट और बढ़ती मांग ने कीमतों को पहुंचाया रिकॉर्ड ऊंचाई पर

Published on: January 11, 2026
Copper becoming the 'new silver' supply crisis
द देवरिया न्यूज़,बिजनेस : पिछले साल सोने और चांदी की कीमतों में जोरदार तेजी देखने को मिली, लेकिन निवेशकों का ध्यान जिस धातु ने सबसे ज्यादा खींचा, वह तांबा रहा। एमसीएक्स पर 29 दिसंबर को तांबे की कीमत करीब 1,400 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में 6 जनवरी को इसकी कीमत 6.069 डॉलर प्रति पाउंड रही। एक साल पहले यह 3.802 डॉलर प्रति पाउंड थी। यानी महज एक साल में तांबे ने करीब 60 फीसदी का रिटर्न दिया। इसी वजह से बाजार में इसे अब ‘नया चांदी’ कहा जाने लगा है।

तांबे का इस्तेमाल वायरिंग, केबल, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, रिन्यूएबल एनर्जी, डेटा सेंटर्स और बिजली ग्रिड में बड़े पैमाने पर होता है। बीते कुछ समय से इसकी सप्लाई लगातार टाइट बनी हुई है, जबकि मांग तेजी से बढ़ रही है। यही कारण है कि इसकी कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल रहा है और आगे भी तेजी बने रहने की उम्मीद जताई जा रही है।

तांबे को ऐतिहासिक रूप से ‘चमत्कारी धातु’ माना जाता रहा है। माना जाता है कि करीब दस हजार साल पहले जब इंसान ने पहली बार तांबे के औजार बनाए थे, तब भी इसे विकास का आधार माना गया था। आज एक बार फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था का अगला चरण तांबे पर टिका दिख रहा है। निवेशक हों या बड़े उद्योग, सभी इसकी अहमियत को समझने लगे हैं।

सप्लाई संकट ने बढ़ाई कीमतें

एमसीएक्स पर पिछले साल तांबे की कीमतों में करीब 61 फीसदी की तेजी आई। इसके पीछे कई बड़े कारण हैं। एक ओर AI डेटा सेंटर्स, इलेक्ट्रिक गाड़ियां, रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स और पावर ग्रिड के विस्तार से मांग बढ़ रही है, तो दूसरी ओर दुनिया भर में तांबे की सप्लाई बाधित हो रही है।

दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक देश चिली में खदानों में हड़तालें चल रही हैं। कांगो में उत्पादन प्रभावित है, जबकि इंडोनेशिया की ग्रासबर्ग खदान ने ‘फोर्स मेज्योर’ घोषित कर दिया है। यह खदान दुनिया के करीब 3 फीसदी तांबे की सप्लाई करती है। हाल ही में चिली की मंटोवर्टे खदान में भी हड़ताल शुरू हो गई है, जिससे बाजार की चिंताएं और बढ़ गई हैं।

इस बीच लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) में तांबे का स्टॉक घटकर 1.42 लाख टन रह गया है, जो कई महीनों का निचला स्तर है। अनुमान है कि 2026 तक रिफाइंड तांबे के बाजार में करीब 1.5 लाख टन की कमी हो सकती है।

अमेरिका और भू-राजनीति का असर

अमेरिका ने तांबे को अब ‘महत्वपूर्ण खनिज’ की श्रेणी में शामिल कर लिया है। इसे सिर्फ औद्योगिक कच्चा माल नहीं, बल्कि रणनीतिक संसाधन माना जाने लगा है। आशंका है कि अमेरिका रिफाइंड तांबे पर टैरिफ लगा सकता है। इसी डर से सप्लाई अमेरिकी गोदामों की ओर शिफ्ट हो रही है। इसका नतीजा यह है कि COMEX में स्टॉक बढ़ रहा है, जबकि LME और शंघाई जैसे बाजारों में कमी दिख रही है।

भारत में बढ़ती मांग

भारत में मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड में तांबे की खदानें हैं, जिनसे हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड उत्पादन करती है। इसके बावजूद भारत अपनी जरूरत का करीब 90 फीसदी कॉपर कंसंट्रेट आयात करता है।
वर्ष 2024-25 में भारत में तांबे का उत्पादन करीब 5 लाख टन रहा, जबकि मांग 18 लाख टन थी। अनुमान है कि 2030 तक यह मांग 32 लाख टन और 2047 तक 98 लाख टन से अधिक पहुंच सकती है। डेटा सेंटर्स, इलेक्ट्रिक वाहनों और एनर्जी ट्रांजिशन से भारत में तांबे की खपत और तेज होने वाली है।

कहां तक जा सकती हैं कीमतें

जानकारों का मानना है कि मध्यम अवधि में तांबे की कीमतें 15,000 डॉलर प्रति टन तक पहुंच सकती हैं। नई खदानों में निवेश महंगा है, अयस्क की गुणवत्ता गिर रही है और प्रोजेक्ट्स को शुरू होने में लंबा समय लगता है। ऐसे में मांग के मुकाबले सप्लाई कमजोर बनी रहने की संभावना है।

हालांकि तांबा चांदी की तरह कीमती धातु नहीं है और इसका इस्तेमाल पूरी तरह औद्योगिक है, लेकिन सप्लाई संकट और मजबूत वैश्विक मांग ने इसे निवेशकों के लिए आकर्षक बना दिया है। करीब 10,000 साल बाद तांबा एक बार फिर विकास की नई कहानी लिखने को तैयार दिख रहा है।


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