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कैलाश मानसरोवर यात्रा पर नया विवाद, लिपुलेख मार्ग को लेकर नेपाल ने जताई आपत्ति

Published on: May 6, 2026
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द  देवरिया न्यूज़,काठमांडू/नई दिल्ली : भारत सरकार द्वारा कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू करने के ऐलान के बाद लिपुलेख दर्रे को लेकर नेपाल ने आपत्ति जताई है, जिससे एक बार फिर सीमा विवाद चर्चा में आ गया है। नेपाल का कहना है कि भारत इस मार्ग का उपयोग उसकी सहमति के बिना नहीं कर सकता।
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र 1816 की सुगौली संधि के आधार पर नेपाल का हिस्सा हैं। मंत्रालय ने भारत और चीन दोनों से आग्रह किया है कि इस क्षेत्र में किसी भी गतिविधि से पहले नेपाल की स्थिति का सम्मान किया जाए।
भारत की ओर से पहले भी इस दावे को खारिज किया जाता रहा है और नई दिल्ली का कहना है कि यह क्षेत्र उसके प्रशासनिक नियंत्रण में है। भारत कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले स्थित लिपुलेख दर्रे और सिक्किम के नाथुला दर्रे का उपयोग करता रहा है।
लिपुलेख दर्रा भारत, नेपाल और चीन (तिब्बत) के त्रिकोणीय जंक्शन के पास स्थित है और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। यह मुद्दा 2020 में उस समय प्रमुखता से सामने आया था, जब भारत ने इस क्षेत्र में सड़क निर्माण किया था, जिस पर नेपाल ने कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके बाद नेपाल ने अपने आधिकारिक नक्शे में इस क्षेत्र को शामिल किया था।
नेपाल के पूर्व राजदूत शंकर प्रसाद शर्मा ने कहा कि जब कोई सीमा विवाद देश के संवैधानिक ढांचे का हिस्सा बन जाता है, तो किसी भी सरकार के लिए उससे पीछे हटना आसान नहीं होता। उन्होंने जोर दिया कि इस मुद्दे का समाधान कूटनीतिक बातचीत के जरिए ही संभव है।
विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल में विभिन्न राजनीतिक दल इस मुद्दे पर लगभग एकमत हैं, जिसके चलते सरकारों के रुख में निरंतरता बनी रहती है। वहीं, भारत के लिए यह क्षेत्र सामरिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहीं से कैलाश मानसरोवर यात्रा का एक प्रमुख मार्ग गुजरता है।
इस बीच, भारत-चीन व्यापार के लिए लिपुलेख मार्ग के उपयोग पर भी नेपाल ने असंतोष जताया है। ऐसे में यह विवाद केवल धार्मिक यात्रा तक सीमित न रहकर व्यापक रणनीतिक और कूटनीतिक महत्व का मुद्दा बनता जा रहा है।

इसे भी पढ़ें : ईरान का अमेरिका को 14-सूत्रीय प्रस्ताव, युद्ध खत्म करने के साथ परमाणु वार्ता का संकेत


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