ईरानी सैन्य कमान ‘खातम अल-अंबिया’ ने सरकारी टेलीविजन पर जारी बयान में कहा कि जब तक अमेरिका ईरानी जहाजों की आवाजाही पर लगी रोक नहीं हटाता, तब तक होर्मुज जलडमरूमध्य पर कड़ा नियंत्रण जारी रहेगा। ईरान ने अमेरिका पर आरोप लगाया है कि उसने समझौते के बावजूद ईरानी बंदरगाहों से आने-जाने वाले जहाजों की नौसैनिक नाकेबंदी जारी रखी, जो वादाखिलाफी के बराबर है।
बयान में कहा गया, “जब तक ईरान के जहाजों के लिए पूर्ण नौवहन स्वतंत्रता बहाल नहीं होती, तब तक होर्मुज जलडमरूमध्य सशस्त्र बलों के कड़े नियंत्रण में रहेगा।” ईरान ने अमेरिकी कार्रवाई को “समुद्री डकैती” तक करार दिया है, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव और गहरा गया है।
24 घंटे में पलटा फैसला
गौरतलब है कि शुक्रवार को ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने होर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने की घोषणा की थी। अराघची ने कहा था कि यह मार्ग अब पूरी तरह वाणिज्यिक जहाजों के लिए खुला है। लेकिन उनके इस बयान की ईरान के अंदर ही कड़ी आलोचना हुई।
ईरान की प्रमुख समाचार एजेंसियों—फार्स और तस्नीम—ने इस फैसले पर सवाल उठाए। माना जा रहा है कि इस आलोचना के पीछे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) का प्रभाव है। कई रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान की सरकार और IRGC के बीच इस मुद्दे पर मतभेद हैं। जहां सरकार कूटनीतिक समाधान चाहती है, वहीं IRGC सख्त रुख अपनाने के पक्ष में है।
अंदरूनी मतभेद भी बढ़े
विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज को खोलने के फैसले के बाद ईरान के भीतर सत्ता संतुलन को लेकर तनाव बढ़ा। IRGC, जो ईरान की सैन्य और रणनीतिक नीति में बड़ा प्रभाव रखता है, इस तरह के किसी भी समझौते को लेकर सख्त रुख अपनाता रहा है। यही कारण है कि महज 24 घंटे के भीतर ही नीति में बदलाव देखने को मिला।
ईरान ने 17 अप्रैल 2026 को लेबनान में संघर्ष विराम के बाद होर्मुज को खोलने का वादा किया था, लेकिन अब वह इससे पीछे हट गया है। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार और खासकर तेल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है।
वैश्विक असर की आशंका
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से रोजाना वैश्विक कच्चे तेल का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। ऐसे में इस मार्ग पर किसी भी तरह की रुकावट का असर सीधे तौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर पड़ता है।
ईरान और अमेरिका के बीच यह टकराव ऐसे समय में बढ़ रहा है जब पहले से ही क्षेत्र में अस्थिरता बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबी खिंचती है, तो इससे तेल की कीमतों में उछाल और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बाधा जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
फिलहाल, दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या दोनों देश कूटनीतिक रास्ता अपनाते हैं या यह तनाव किसी बड़े टकराव में बदलता है।