द देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली : पश्चिम बंगाल में पहली बार सरकार बनाने के बाद अब भारतीय जनता पार्टी की नजर पंजाब पर टिक गई है। अगले साल फरवरी-मार्च में पंजाब समेत उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें पंजाब ऐसा राज्य है जहां BJP अब तक अपने दम पर सत्ता तक नहीं पहुंच सकी है। हालांकि पार्टी पहले शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन में सरकार का हिस्सा रह चुकी है, लेकिन अब वह अकेले अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटी हुई है।
पंजाब में 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए 117 में से 92 सीटों पर कब्जा किया था। लेकिन अब राज्य की राजनीति तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। पार्टी के कई बड़े नेताओं और राज्यसभा सांसदों के BJP में जाने, प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई और अंदरूनी गुटबाजी ने AAP के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। ऐसे में पंजाब में पार्टी का संगठन और विधायकों को एकजुट रखना उसके लिए कठिन होता जा रहा है।
दिल्ली के बाद पंजाब पर टिकी AAP की उम्मीद
दिल्ली में सत्ता गंवाने के बाद पंजाब अब AAP के लिए सबसे अहम राज्य बन गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पंजाब में भी पार्टी कमजोर पड़ती है तो उसका राष्ट्रीय विस्तार प्रभावित हो सकता है। यही वजह है कि भगवंत मान सरकार लगातार अपने जनाधार को बचाए रखने की कोशिश कर रही है।
हालांकि विपक्ष लगातार सरकार को कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं के मुद्दे पर घेर रहा है। BJP ने राज्य सरकार के एक मंत्री पर कार्रवाई को भी बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाया है। पार्टी का आरोप है कि AAP ने चुनाव के दौरान महिलाओं, युवाओं और किसानों से किए गए कई वादे पूरे नहीं किए।
स्थानीय मुद्दों पर फोकस कर रही BJP
पंजाब में BJP ने अपनी रणनीति पूरी तरह स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित कर दी है। पश्चिम बंगाल में पार्टी ने तुष्टिकरण, महिला सुरक्षा और अवैध घुसपैठ जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया था। अब पंजाब में पार्टी कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और नशे के कारोबार को बड़ा चुनावी मुद्दा बना रही है।
राज्य में नशा लंबे समय से गंभीर समस्या बना हुआ है और BJP इसे चुनावी अभियान का प्रमुख हिस्सा बनाने की तैयारी में है। पार्टी का कहना है कि पंजाब की युवा पीढ़ी नशे की चपेट में है लेकिन राज्य सरकार इस पर प्रभावी नियंत्रण नहीं कर सकी।
इसके अलावा BJP यह भी आरोप लगा रही है कि AAP सरकार ने महिलाओं को आर्थिक सहायता और रोजगार जैसे जिन वादों के आधार पर सत्ता हासिल की थी, उन्हें पूरा नहीं किया गया।
कृषि कानूनों का असर अभी भी चुनौती
हालांकि BJP के सामने सबसे बड़ी चुनौती अभी भी कृषि कानूनों को लेकर किसानों की नाराजगी मानी जा रही है। 2020 के किसान आंदोलन के दौरान पंजाब में BJP के खिलाफ माहौल काफी मजबूत हुआ था। इसका असर पार्टी को ग्रामीण इलाकों में चुनावी नुकसान के रूप में देखने को मिला।
अब BJP कोशिश कर रही है कि किसान आंदोलन की छवि से बाहर निकलकर विकास, रोजगार और सुरक्षा के मुद्दों पर जनता को अपने साथ जोड़ा जाए। पार्टी नेताओं का मानना है कि समय के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी BJP के प्रति सोच बदल रही है।
AAP में टूट का फायदा उठाने की तैयारी
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि AAP से BJP में शामिल हुए छह राज्यसभा सांसद पंजाब की राजनीति में बड़ा असर डाल सकते हैं। BJP का मानना है कि इन नेताओं के जरिए वह AAP के संगठनात्मक ढांचे को कमजोर करने में सफल होगी।
पार्टी के पूर्व रणनीतिकार रहे राघव चड्ढा और संदीप पाठक जैसे नेताओं की भूमिका पर भी नजर बनी हुई है। दलबदल के बाद BJP लगातार AAP के अंदरूनी मतभेदों को उजागर करने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले महीनों में यदि AAP के भीतर असंतोष बढ़ता है तो इसका सीधा फायदा BJP और कांग्रेस दोनों को मिल सकता है।
क्या फिर साथ आएंगे BJP और अकाली दल?
पंजाब की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल BJP और शिरोमणि अकाली दल के संभावित गठबंधन को लेकर भी है। 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर दोनों दलों का दशकों पुराना गठबंधन टूट गया था।
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले दोनों दलों के फिर साथ आने की चर्चाएं जरूर हुई थीं, लेकिन कोई औपचारिक समझौता नहीं हो पाया। अब विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि दोनों दल राजनीतिक समीकरणों पर विचार कर सकते हैं।
हालांकि दोनों पार्टियों के नेता सार्वजनिक तौर पर यही कह रहे हैं कि वे सभी सीटों पर अलग-अलग तैयारी कर रहे हैं। लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि चुनाव नजदीक आने पर परिस्थितियों के अनुसार गठबंधन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
पंजाब में मुकाबला होगा दिलचस्प
पिछले विधानसभा चुनाव में AAP ने 92 सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया था, जबकि कांग्रेस को 18, शिरोमणि अकाली दल को 3 और BJP को केवल 2 सीटें मिली थीं। लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए इस बार मुकाबला कहीं ज्यादा दिलचस्प और त्रिकोणीय होने की संभावना जताई जा रही है।
BJP जहां पंजाब में अपने संगठन को विस्तार देने और सत्ता तक पहुंचने की कोशिश में है, वहीं AAP अपने सबसे मजबूत गढ़ को बचाने की चुनौती का सामना कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस और अकाली दल भी नए समीकरण बनाने में जुटे हुए हैं। आने वाले महीनों में पंजाब की राजनीति और ज्यादा गर्म होने के संकेत मिल रहे हैं।
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