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सिंधु जल समझौते पर पाकिस्तान की बेचैनी बढ़ी, भारत के रुख से अंतरराष्ट्रीय मंच पर मुश्किलें

Published on: September 6, 2026
Pakistan on Indus water agreement

द  देवरिया न्यूज़,इस्लामाबाद/नई दिल्ली। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा सिंधु जल संधि (IWT) को स्थगित किए जाने के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच पानी का मुद्दा लगातार तनाव का केंद्र बना हुआ है। पिछले करीब सवा साल में पाकिस्तान ने इस मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने से लेकर भारत के खिलाफ कड़े बयान देने तक कई प्रयास किए हैं। वहीं, भारत अपने फैसले पर कायम है और सिंधु जल संधि से जुड़े विवादों में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की प्रक्रिया को स्वीकार करने से इनकार करता रहा है।

पाकिस्तान की ओर से इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने के प्रयासों के बीच भारत ने स्पष्ट किया है कि वह उस कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन की कार्यवाही को स्वीकार नहीं करता, जिसकी स्थापना सिंधु जल संधि से जुड़े विवाद को लेकर हुई थी।

भारत ने कोर्ट की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लिया

भारत का रुख है कि उसने कभी भी इस कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया। इसी वजह से भारत ने इसकी कार्यवाही में भाग नहीं लिया और उसके फैसले को अपने ऊपर बाध्यकारी मानने से भी इनकार किया है। भारत ने यह भी कहा है कि सिंधु जल संधि के तहत विवादों के समाधान के लिए निर्धारित अलग-अलग प्रक्रियाओं का इस्तेमाल क्रमवार किया जाना चाहिए। नई दिल्ली के मुताबिक, एक ही विवाद के लिए समानांतर रूप से अलग-अलग विवाद समाधान तंत्र शुरू करना संधि की मूल भावना के अनुरूप नहीं है। भारत ने वर्ल्ड बैंक द्वारा कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन गठित किए जाने का भी विरोध किया था। भारत का कहना है कि संधि के तहत पाकिस्तान के साथ मतभेदों के समाधान के लिए न्यूट्रल एक्सपर्ट की प्रक्रिया पहले से मौजूद है।

हेग के फैसले को भी भारत ने नहीं माना

सिंधु जल विवाद को लेकर हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन से आया फैसला भी भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद को और गहरा कर चुका है। पाकिस्तान ने इसे अपने पक्ष में महत्वपूर्ण कदम के तौर पर पेश किया, जबकि भारत ने फैसले को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

भारत का तर्क है कि जिस मंच के अधिकार क्षेत्र को उसने स्वीकार ही नहीं किया, उसके फैसले को मानने की बाध्यता भी उस पर लागू नहीं होती। नई दिल्ली ने सिंधु जल संधि से जुड़े अपने संप्रभु फैसलों में बाहरी न्यायिक हस्तक्षेप के अधिकार क्षेत्र पर भी सवाल उठाया है।

पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने में लगा

पाकिस्तान की कोशिश रही है कि सिंधु जल समझौते के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाकर भारत पर दबाव बनाया जाए। इस दौरान इस्लामाबाद की ओर से विभिन्न देशों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाया गया है। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने NDTV में लिखे एक लेख में कहा है कि पाकिस्तान कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के फैसले का इस्तेमाल अपने अंतरराष्ट्रीय अभियान और प्रचार के लिए कर सकता है। हालांकि, उनके मुताबिक भारत इस दावे को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है।

IWT को लेकर भारत का क्या तर्क है?

भारत की ओर से यह तर्क दिया जाता रहा है कि सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ द्विपक्षीय समझौता है। यह दोनों देशों की सरकारों की मंजूरी के बाद लागू हुआ था। भारत संधि से जुड़े विवादों के समाधान के लिए निर्धारित व्यवस्था और उसके अधिकार क्षेत्र की अपनी व्याख्या पर कायम है। नई दिल्ली का मानना है कि संधि में विवाद निपटाने के लिए अलग-अलग स्तरों की जो व्यवस्था बनाई गई है, उसे एक साथ सक्रिय करने के बजाय निर्धारित क्रम के अनुसार अपनाया जाना चाहिए।

संधि की विवाद समाधान व्यवस्था पर भी सवाल

सिंधु जल संधि के विवाद समाधान तंत्र में कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन की भूमिका को लेकर भी भारत ने सवाल उठाए हैं। संधि के एनेक्सचर जी में न्यायिक और तकनीकी सदस्यों के चयन की प्रक्रिया का प्रावधान है। इस व्यवस्था के तहत तकनीकी और कानूनी सदस्यों के चयन में अमेरिका और ब्रिटेन के प्रमुख संस्थानों तथा न्यायिक पदों से जुड़े अधिकारियों की भूमिका निर्धारित की गई है। भारत के आलोचकों का मानना है कि यह व्यवस्था संधि के पुराने और औपनिवेशिक दौर के अंतरराष्ट्रीय ढांचे की छाप दिखाती है।

फिलहाल सिंधु जल को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच गतिरोध बना हुआ है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय समर्थन के जरिए भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि भारत अपने रुख में बदलाव के संकेत नहीं दे रहा है। ऐसे में आने वाले समय में सिंधु जल समझौता दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव का एक अहम मुद्दा बना रह सकता है।


इसे भी पढ़ें : रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की बड़ी छलांग, 405 सैन्य उपकरणों का होगा स्वदेशीकरण; भारत में ही होगी खरीद


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