द देवरिया न्यूज़,काठमांडू : चीन के महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) में नेपाल के शामिल होने को कभी दक्षिण एशिया की बड़ी भू-राजनीतिक घटना माना गया था। साल 2017 में नेपाल ने चीन के साथ इस परियोजना के लिए समझौता किया था। उस समय उम्मीद जताई गई थी कि BRI के जरिए नेपाल में सड़क, रेलवे, ऊर्जा, पर्यटन और व्यापारिक ढांचे का तेजी से विकास होगा। लेकिन नौ साल बाद भी स्थिति यह है कि अधिकांश परियोजनाएं कागजों और बैठकों तक ही सीमित दिखाई दे रही हैं।
चीन ने 2013 में BRI परियोजना की शुरुआत की थी और उसी दौरान नेपाल के सामने भी इसका प्रस्ताव रखा गया था। इसके बाद 12 मई 2017 को दोनों देशों ने आधिकारिक रूप से समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए। नेपाल ने इसे भारत पर अपनी आर्थिक और ट्रांजिट निर्भरता कम करने के अवसर के रूप में देखा था। नेपाल की सोच थी कि चीन के सहयोग से बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, रेलवे नेटवर्क और हाइड्रोपावर परियोजनाएं विकसित होंगी।
हालांकि, नौ वर्षों के बाद भी BRI के तहत नेपाल में जमीन पर बहुत कम काम दिखाई देता है। सबसे चर्चित परियोजना पोखरा इंटरनेशनल एयरपोर्ट रही, जिसे चीन ने BRI का हिस्सा बताया था, लेकिन नेपाल ने बाद में इस दावे पर सवाल उठाए। यह परियोजना बाद में भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों में भी घिर गई। अब नेपाल चाहता है कि भारत इस एयरपोर्ट को मान्यता दे, ताकि वहां वाणिज्यिक उड़ानों का विस्तार हो सके।
विशेषज्ञों के मुताबिक, BRI के तहत नेपाल और चीन के बीच सबसे बड़ी समस्या परियोजनाओं की फंडिंग और कर्ज मॉडल को लेकर रही। नेपाल चाहता था कि चीन अधिकतर परियोजनाओं में अनुदान आधारित निवेश करे, जबकि चीन कई मामलों में ऋण आधारित मॉडल पर आगे बढ़ना चाहता था। नेपाल में इस बात को लेकर चिंता बढ़ी कि भारी विदेशी कर्ज देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ बन सकता है।
सबसे ज्यादा चर्चा चीन-नेपाल रेलवे परियोजना को लेकर हुई थी। इस परियोजना के तहत तिब्बत को काठमांडू से जोड़ने की योजना बनाई गई थी। इसे नेपाल के लिए गेम चेंजर बताया गया था, लेकिन हिमालयी भूभाग और अत्यधिक लागत के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस रेलवे की लागत बहुत अधिक होगी जबकि आर्थिक रिटर्न सीमित रहेगा।
नेपाल की आंतरिक राजनीति भी BRI परियोजनाओं की धीमी रफ्तार की बड़ी वजह रही। पिछले कुछ वर्षों में देश में सरकारें लगातार बदलती रहीं, जिससे नीतियों में स्थिरता नहीं आ सकी। कई परियोजनाओं पर शुरुआती सहमति बनने के बावजूद उन्हें अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका।
वर्तमान प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार के आने के बाद BRI को लेकर नई चर्चाएं शुरू हुई हैं। हालांकि काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल और चीन के बीच हाल के महीनों में BRI को लेकर कोई बड़ी बातचीत नहीं हुई है। नेपाली विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि उच्च स्तरीय दौरों के बाद ही इस दिशा में आगे की बातचीत संभव हो सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल में चीन के राजदूत ने हाल के समय में कई मंत्रियों और नेताओं से मुलाकात की, लेकिन BRI, ट्रांस-हिमालयन कनेक्टिविटी नेटवर्क या प्रस्तावित रेलवे परियोजना पर बहुत कम चर्चा हुई। इससे संकेत मिलते हैं कि वर्तमान नेपाली नेतृत्व इस मुद्दे पर फिलहाल सतर्क रुख अपनाए हुए है।
नेपाल के BRI रुख पर भारत और अमेरिका का प्रभाव भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत BRI को दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते रणनीतिक प्रभाव के रूप में देखता है, जबकि अमेरिका भी इसे चीन की भू-राजनीतिक विस्तार नीति का हिस्सा मानता है। ऐसे में नेपाल लगातार भारत और चीन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता रहा है।
विदेश नीति विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह आर्थिक विकास की जरूरतों और भू-राजनीतिक संतुलन के बीच कैसे रास्ता निकाले। अगर BRI परियोजनाएं बड़े स्तर पर लागू होती हैं तो नेपाल को भारत, चीन और पश्चिमी देशों के बीच बेहद सावधानी से संतुलन बनाना होगा।
फिलहाल, नेपाल में BRI की तस्वीर उम्मीदों से काफी अलग नजर आती है। नौ साल बाद भी ज्यादातर योजनाएं घोषणाओं, बैठकों और रणनीतिक चर्चाओं तक सीमित हैं, जबकि जमीन पर अपेक्षित विकास अभी दिखाई नहीं दे रहा है।
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