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दिल्ली का ‘एयरपोकैलिप्स’ पल: क्या बीजिंग जैसा करिश्मा दोहरा पाएगी भारत की राजधानी?

Published on: December 3, 2025
Delhi's 'airpocalypse' moment

द देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली: एक दौर ऐसा था जब चीन की राजधानी बीजिंग काले धुएं के बादलों में डूबी रहती थी। वहां की हवा इतनी जहरीली हो गई थी कि लोगों की आंखों में जलन होने लगती थी और सांस लेना मुश्किल हो गया था। कई लोग लगातार खांसते-खांसते परेशान हो जाते थे और सांस संबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ गई थीं। साल 2013 में हालात इतने बिगड़ गए थे कि चीन सरकार को स्कूल तक बंद करने पड़े थे। इस भयावह स्थिति को ‘एयरपोकैलिप्स’ कहा गया। हालांकि, बीजिंग ने जल्द ही हालात काबू किए और अब वहां की जनता साफ हवा में सांस ले रही है। बीजिंग की इस कहानी को देखकर क्या दिल्ली की मौजूदा स्थिति याद नहीं आती? क्या दिल्ली भी बीजिंग जैसा चमत्कार कर सकती है?

बीजिंग की तरह हालात झेल रही दिल्ली

दिल्ली की स्थिति आज 2013 के बीजिंग से बहुत अलग नहीं है। जहरीली हवा ने दिल्लीवासियों का जीना मुश्किल कर दिया है। एयर क्वालिटी लगातार खराब और बेहद खराब श्रेणी में बनी हुई है। केंद्र और दिल्ली सरकारों द्वारा फैसले और पाबंदियां लागू करने के बावजूद हवा की गुणवत्ता में ज्यादा सुधार नहीं दिख रहा।

चीन ने आखिर क्या किया जो हवा साफ हो गई?

सुप्रीम कोर्ट ने भी दिल्ली की इस हालत पर चिंता जताते हुए कहा कि वायु प्रदूषण पर अब चुप नहीं बैठा जा सकता। ऐसे में सवाल उठता है कि चीन ने 2013 के गंभीर हालात से निकलने के लिए कौन से कदम उठाए? और भारत क्यों वैसी सख्ती नहीं दिखा पा रहा? बीजिंग ही नहीं, लंदन जैसे शहरों ने भी प्रदूषण रोकने के लिए कड़े कदम उठाए और हवा की गुणवत्ता सुधारी। फिर दिल्ली में यह परिवर्तन क्यों नहीं?

2013 में बीजिंग का ‘एयरपोकैलिप्स’

बीजिंग की हवा 2013 में इतनी खराब हुई कि ‘एयरपोकैलिप्स’ शब्द गढ़ा गया। हाल ही में दिल्ली की हवा भी नवंबर में बेहद खराब स्तर पर पहुंच गई। AQI 400 के पार चला गया और सरकार को ग्रैप-3 में भी ग्रैप-4 जैसी पाबंदियां लगानी पड़ीं। बावजूद इसके दिल्ली की हवा बेहद खराब बनी हुई है।

बीजिंग ने कैसे सुधारी हवा?

दिल्ली हर सर्दी प्रदूषण की समस्या से जूझती है। वही दिक्कत बीजिंग में भी थी। साल 2013 में PM2.5 की वार्षिक औसत मात्रा 101.5 µgm/m3 थी, जो 2024 तक घटकर 40 µgm/m3 रह गई। दिल्ली और बीजिंग दोनों की भौगोलिक स्थिति समान है—दोनों शहर बेसिन में बसे हैं, जहां प्रदूषित हवा आसानी से बाहर नहीं निकलती।

बीजिंग ने ‘ब्लू स्काई’ के लिए लड़ाई लड़ी

2014 में चीन ने प्रदूषण के खिलाफ ‘युद्ध’ की घोषणा कर दी। लक्ष्य था—PM10 और PM2.5 में कमी लाना, पुराने ऊर्जा प्लांट हटाना और प्रदूषणकारी उद्योगों को बाहर शिफ्ट करना। बीजिंग ने वह सख्ती दिखाई, जो दिल्ली में अभी नज़र नहीं आती।

परिवहन सुधार, पार्किंग रोक, सेंसर लगाए

बीजिंग में 1,000 से अधिक निगरानी सेंसर लगाए गए। सार्वजनिक परिवहन बढ़ाया गया, पैदल चलने और साइकिल चलाने के लिए बेहतर सुविधाएं दी गईं। निजी वाहनों पर पाबंदियां लगाईं, पार्किंग सीमित की और लोग भी बदलाव के लिए आगे आए।

वाहन उत्सर्जन पर कड़ा एक्शन

2017 में बीजिंग ने यूरो VI मानक लागू किए। पुरानी गाड़ियों को स्क्रैपिंग नीति से हटाया गया। इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिया गया, आज बीजिंग में 4 लाख से ज्यादा EV हैं और 2 लाख चार्जिंग पॉइंट हैं।

कोयले पर निर्भरता घटाई, प्रदूषणकारी उद्योग हटे

बीजिंग ने कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को प्राकृतिक गैस में बदला और आसपास के क्षेत्रों की हजारों फैक्ट्रियों पर कार्रवाई की। 2013 से 2017 के बीच PM2.5 में 35% और 2023 तक कुल 60% की गिरावट दर्ज की गई।

अमेरिका को जहां दशकों लगे, चीन ने कुछ साल में कर दिखाया

शिकागो विश्वविद्यालय की रिपोर्ट बताती है कि वायु गुणवत्ता में इतनी गिरावट अमेरिकी शहरों को हासिल करने में कई दशक लगे। 2013–2020 के दौरान दुनिया में प्रदूषण कमी का तीन-चौथाई हिस्सा चीन का योगदान था।

क्या दिल्ली भी दोहरा पाएगी यह करिश्मा?

भारत ने 2019 में ‘राष्ट्रीय स्वच्छ वायु नीति’ शुरू की, लेकिन बीजिंग जैसी सख्ती और तेज़ एक्शन अब भी दिखाई नहीं देता। ऐसे में सवाल यही है—क्या दिल्ली भी बीजिंग से सीखकर हवा साफ करने का बड़ा कदम उठाएगी?


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