द देवरिया न्यूज़,न्यूयॉर्क : भारत में जारी छात्र प्रदर्शनों को लेकर संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिक्रिया दी है। संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता स्टीफन डुजारिक ने कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने वाले लोगों को बिना किसी उत्पीड़न, गिरफ्तारी या चोट के डर के प्रदर्शन करने की अनुमति दी जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी है कि वे लोगों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करें।
संयुक्त राष्ट्र प्रवक्ता से भारत में करीब एक महीने से जारी छात्र प्रदर्शनों को लेकर सवाल पूछा गया था। सवाल में दावा किया गया कि प्रदर्शन के दौरान सैकड़ों छात्र घायल हुए हैं और प्रदर्शनकारी शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के साथ-साथ शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहे हैं। उनसे पूछा गया कि इस पूरे मामले पर संयुक्त राष्ट्र का क्या रुख है।
इसके जवाब में डुजारिक ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र नई दिल्ली में हो रहे विरोध प्रदर्शनों से अवगत है। उन्होंने कहा कि जो लोग शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करना चाहते हैं, उन्हें ऐसा करने की अनुमति मिलनी चाहिए और उन्हें उत्पीड़न, गिरफ्तारी या चोट के डर में नहीं रहना चाहिए।
सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी पर दिया जोर
संयुक्त राष्ट्र प्रवक्ता ने कहा कि सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी है कि वे शांतिपूर्ण प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करें। उन्होंने कहा कि यह सिद्धांत भारत ही नहीं, बल्कि हर जगह लागू होता है।
डुजारिक की टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब भारत में छात्र प्रदर्शनों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस जारी है। प्रदर्शनकारी परीक्षा और शिक्षा व्यवस्था में सुधार के साथ अपनी अन्य मांगों को लेकर भी आवाज उठा रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र में औपचारिक शिकायत दर्ज होने का दावा
रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) की स्पेशल प्रोसीजर्स शाखा में भी एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई है। शिकायत में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों का आरोप लगाया गया है।
शिकायत में करीब 70 प्रदर्शनकारियों को कथित तौर पर मनमाने ढंग से हिरासत में लेने, बड़ी संख्या में एफआईआर दर्ज करने और पुलिस कार्रवाई के आरोप लगाए गए हैं। इसमें शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे लोगों पर कथित लाठीचार्ज का भी जिक्र किया गया है।
हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित भारतीय अधिकारियों की ओर से प्रतिक्रिया और उनका आधिकारिक पक्ष भी इस पूरे मामले को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी उठाए सवाल
एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) जैसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर चिंता जताई है। इन संगठनों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित तौर पर लाठी और आंसू गैस के इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं।
कुछ रिपोर्टों में पेलेट गन के कथित इस्तेमाल, मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और मोबाइल इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध जैसे कदमों का भी उल्लेख किया गया है। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान अत्यधिक बल का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए और लोगों को अपनी बात रखने का अधिकार मिलना चाहिए।
HRW ने भी जारी किया था बयान
इससे पहले ह्यूमन राइट्स वॉच ने 23 जुलाई को जारी एक बयान में कहा था कि 20 जुलाई को नई दिल्ली में छात्रों और युवाओं के विरोध प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए भारतीय सुरक्षा बलों ने कथित तौर पर आंसू गैस और लाठियों का इस्तेमाल किया।
संगठन ने भारत सरकार से कथित तौर पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग के आरोपों की तत्काल और निष्पक्ष जांच कराने की अपील की थी। साथ ही, शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति देने की बात कही थी।
HRW ने मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को बंद करने या प्रतिबंधित करने पर भी चिंता जताई थी। संगठन का तर्क है कि इंटरनेट बंद होने से लोगों के लिए आपात स्थिति में जानकारी हासिल करना और सहायता प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है।
शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर जोर
संयुक्त राष्ट्र के बयान के बाद भारत में प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था को लेकर बहस एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गई है। संयुक्त राष्ट्र ने अपने बयान में किसी विशेष राजनीतिक मांग का समर्थन नहीं किया, बल्कि व्यापक रूप से शांतिपूर्ण प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा पर जोर दिया है।
वहीं, भारत में कानून-व्यवस्था बनाए रखना और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार तथा सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी है। ऐसे में चुनौती यह है कि प्रदर्शनकारियों के अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए।
फिलहाल, संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की टिप्पणियों के बाद भारत में जारी छात्र प्रदर्शनों को लेकर बहस और तेज होने की संभावना है।
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