भारत में चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि दलाई लामा के पुनर्जन्म का फैसला केवल चीन के अधिकार क्षेत्र में आता है। उन्होंने यह भी कहा कि तथाकथित “सेंट्रल तिब्बती एडमिनिस्ट्रेशन” यानी निर्वासित तिब्बती सरकार को किसी भी संप्रभु देश की मान्यता प्राप्त नहीं है और उसके पास तिब्बती लोगों का प्रतिनिधित्व करने या पुनर्जन्म प्रक्रिया पर दावा करने का कोई अधिकार नहीं है।
दलाई लामा के बयान के बाद बढ़ा विवाद
यह विवाद तब और बढ़ गया जब 14वें दलाई लामा ने हाल ही में स्पष्ट कहा कि उनके पुनर्जन्म की पहचान करने का अधिकार केवल “गादेन फोद्रांग ट्रस्ट” के पास होगा। उन्होंने कहा कि किसी अन्य संस्था या सरकार को इस प्रक्रिया में दखल देने का अधिकार नहीं है। इसके जवाब में चीन ने दोहराया कि किसी भी नए दलाई लामा को बीजिंग की मंजूरी जरूरी होगी।
इसके बाद भारत के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरण रिजिजू ने भी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने कहा था कि दलाई लामा के अनुयायी मानते हैं कि पुनर्जन्म का फैसला बौद्ध परंपराओं और स्वयं दलाई लामा की इच्छा के अनुसार होना चाहिए। भारत के इस रुख से चीन असहज दिखाई दे रहा है।
चीन को आखिर डर किस बात का है?
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन नहीं चाहता कि अगला दलाई लामा उसकी पकड़ से बाहर चुना जाए। बीजिंग की कोशिश है कि भविष्य का दलाई लामा चीन समर्थक हो ताकि तिब्बत और वहां के बौद्ध समुदाय पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का नियंत्रण बना रहे।
दूसरी ओर, तिब्बती निर्वासित सरकार भारत के धर्मशाला में स्थित है और दलाई लामा भी लंबे समय से भारत में रह रहे हैं। चीन को आशंका है कि अगला दलाई लामा भारत या चीन के बाहर किसी स्वतंत्र स्थान से चुना जा सकता है। ऐसा होने पर तिब्बत पर चीन के दावों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चुनौती मिल सकती है।
चीन का कहना है कि दलाई लामा के पुनर्जन्म की प्रक्रिया चीनी कानूनों और ऐतिहासिक “गोल्डन अर्न” प्रणाली के तहत होनी चाहिए, जिसमें अंतिम मंजूरी चीनी सरकार देती है। हालांकि वर्तमान दलाई लामा पहले ही संकेत दे चुके हैं कि उनका अगला जन्म चीन नियंत्रित तिब्बत में नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा था कि उनका पुनर्जन्म किसी स्वतंत्र देश में हो सकता है, जिसमें भारत की संभावना भी जताई जाती है।
दलाई लामा को चुनने की प्रक्रिया क्या है?
तिब्बती बौद्ध धर्म में दलाई लामा को भगवान बुद्ध का अवतार माना जाता है। उनकी मृत्यु के बाद नए जन्म की खोज की जाती है। यह पूरी प्रक्रिया धार्मिक परंपराओं और आध्यात्मिक संकेतों पर आधारित होती है।
दलाई लामा की मृत्यु के बाद वरिष्ठ भिक्षु और धार्मिक नेता कई संकेतों का अध्ययन करते हैं। माना जाता है कि अंतिम संस्कार के दौरान उठने वाले धुएं की दिशा, शरीर की स्थिति और विशेष सपनों या संकेतों से नए जन्म का अनुमान लगाया जाता है।
इसके बाद भिक्षु तिब्बत की पवित्र झील “ल्हामो ला-त्सो” में ध्यान लगाकर संभावित स्थानों के संकेत खोजते हैं। फिर खोजी दल उन बच्चों की तलाश करता है जिनका जन्म दलाई लामा की मृत्यु के आसपास हुआ हो और जिनमें विशेष गुण दिखाई दें।
संभावित बच्चे की पहचान के लिए उसे पूर्व दलाई लामा की वस्तुओं के बीच असली वस्तुओं को पहचानने की परीक्षा भी दी जाती है। यदि बच्चा सही वस्तुएं चुन लेता है, तो उसे दलाई लामा का पुनर्जन्म माना जाता है।
भारत-चीन रिश्तों पर असर संभव
विश्लेषकों का मानना है कि यदि अगला दलाई लामा भारत में चुना जाता है तो यह भारत-चीन संबंधों में तनाव बढ़ा सकता है। चीन को डर है कि इससे तिब्बती स्वतंत्रता आंदोलन को नई ताकत मिलेगी और सीमा विवाद जैसे मुद्दों पर भू-राजनीतिक दबाव और बढ़ सकता है।