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तमिलनाडु में कांग्रेस की बड़ी दुविधा: डीएमके संग गठबंधन या विजय की TVK से नई राह?

Published on: January 20, 2026
Congress's big dilemma in Tamil Nadu
द देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली : शीर्ष नेतृत्व के साथ लगातार बैठकों के बाद तमिलनाडु कांग्रेस पूरी तरह सक्रिय मोड में आ गई है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी के साथ सप्ताहांत में हुई मैराथन चर्चा के बाद तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी ने 2026 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर सोमवार को एक अहम कार्यकारिणी बैठक बुलाई है। लेकिन तैयारियों के बीच पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि राज्य में उसका भविष्य किस दिशा में जाएगा।

असल दुविधा यह है कि क्या कांग्रेस अपने पुराने और मजबूत सहयोगी डीएमके के साथ गठबंधन जारी रखेगी, या फिर अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेत्रि कझगम’ (TVK) के साथ नए राजनीतिक समीकरण तलाशेगी। डीएमके ने चुनाव जीतने के बाद सत्ता में हिस्सेदारी देने से साफ इनकार कर दिया है, जिससे कांग्रेस के भीतर असंतोष गहराता जा रहा है।

कांग्रेस-डीएमके गठबंधन इस समय अपने सबसे संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस आलाकमान ने राज्य इकाई को गठबंधन मर्यादा बनाए रखने और डीएमके के खिलाफ सार्वजनिक बयानबाजी से बचने की सलाह दी है। इसके बावजूद कई कांग्रेस नेता सत्ता में भागीदारी न मिलने को लेकर खुलकर नाराजगी जता रहे हैं। सांसद मणिकम टैगोर ने डीएमके पर परोक्ष हमला करते हुए केरल के ‘यूडीएफ मॉडल’ का हवाला दिया और कहा कि चुनाव के बाद सहयोगियों को नजरअंदाज करना गठबंधन धर्म के खिलाफ है। उन्होंने डीएमके के रवैये को ‘केंद्रीकृत सोच’ बताया, हालांकि डीएमके ने इन बयानों पर अब तक प्रतिक्रिया नहीं दी है।

इसी बीच अभिनेता विजय की राजनीति में एंट्री और उनकी रैलियों में उमड़ रही भीड़ कांग्रेस के लिए एक नए विकल्प के तौर पर उभर रही है। विजय की पार्टी TVK ने कांग्रेस को अपना ‘स्वाभाविक सहयोगी’ बताया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि डीएमके से अलग होने पर कांग्रेस को सत्ता में हिस्सेदारी की संभावना मिल सकती है और उत्तर भारत में डीएमके से जुड़े विवादों का बोझ भी कम होगा। साथ ही बीजेपी के बढ़ते प्रभाव और संभावित सत्ता विरोधी माहौल से निपटने में भी यह गठबंधन मददगार हो सकता है।

हालांकि यह रास्ता जोखिम से भरा हुआ भी है। डीएमके एक आजमाया हुआ और मजबूत सहयोगी है, जिसने लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को उल्लेखनीय सफलता दिलाई है। तमिलनाडु में कांग्रेस का संगठन कमजोर है और उसका वोट शेयर लगातार घटता गया है। वहीं विजय राजनीति में अभी नए हैं और यह साफ नहीं है कि रैलियों की भीड़ वोटों में तब्दील हो पाएगी या नहीं। यदि विजय का राजनीतिक प्रभाव उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा, तो कांग्रेस न केवल एक भरोसेमंद सहयोगी खो देगी, बल्कि राज्य की राजनीति में हाशिये पर भी जा सकती है।

अब निगाहें कांग्रेस नेतृत्व पर टिकी हैं कि वह जोखिम उठाकर नए प्रयोग की राह चुनता है या फिर सुरक्षित विकल्प के तौर पर डीएमके के साथ गठबंधन बनाए रखता है।


इसे भी पढ़ें : पीएम विश्वकर्मा हाट 2026 का उद्घाटन, कारीगरों को मिला प्रतिभा दिखाने और बाजार से जुड़ने का मंच


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