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अफगानिस्तान-भारत रिश्तों में नई गर्माहट: तालिबान सरकार से बढ़ती नजदीकियां भारत के लिए कैसे फायदेमंद?

Published on: October 15, 2025
Afghanistan-India relations

द देवरिया न्यूज़ : तख्तापलट, गृहयुद्ध और आर्थिक तबाही झेल चुके अफगानिस्तान में अब धीरे-धीरे स्थिरता लौटने की कोशिश हो रही है। तालिबान की सत्ता के दोबारा स्थापित होने के बाद भी यह देश पहचान के संकट से गुजर रहा है, क्योंकि रूस को छोड़कर किसी बड़े देश ने अब तक उसकी सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है। इसके बावजूद भारत और अफगानिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकियां नई कूटनीतिक दिशा की ओर इशारा कर रही हैं।

🔸 अफगानिस्तान की रणनीतिक अहमियत

अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति भारत के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है। भारत पीओके (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और भविष्य में यदि इस क्षेत्र पर कोई कदम उठाया जाता है, तो अफगानिस्तान भारत के लिए रणनीतिक सहयोगी साबित हो सकता है। भारत की अफगानिस्तान से लगभग 106 किलोमीटर लंबी थल सीमा (जो फिलहाल पीओके के हिस्से में आती है) भविष्य में मध्य एशिया और मध्य पूर्व के देशों के लिए सीधा व सस्ता मार्ग प्रदान कर सकती है।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर द्वारा अफगान विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी का गर्मजोशी से स्वागत करना इसी दिशा में भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं को दर्शाता है। माना जा रहा है कि भारत अफगानिस्तान के साथ दूतावास खोलने की तैयारी में है — यदि ऐसा होता है, तो रूस के बाद भारत दूसरा बड़ा देश होगा जो तालिबान सरकार को व्यावहारिक मान्यता देगा।

🔸 अमेरिका और चीन की दिलचस्पी

अफगानिस्तान का भौगोलिक स्थान अमेरिका और चीन दोनों के लिए रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है। अमेरिका बगराम एयरबेस के जरिये ईरान पर नजर रखना चाहता है, जबकि चीन पाकिस्तान-पीओके कॉरिडोर के जरिये मध्य पूर्व तक थलमार्ग बनाना चाहता है। इस खींचतान के बीच भारत का अफगानिस्तान से जुड़ना क्षेत्रीय संतुलन को नया रूप दे सकता है।

अफगानिस्तान इस गठजोड़ के जरिये अमेरिकी दबाव को सीमित करने और चीन-पाकिस्तान की बढ़त को संतुलित करने की कोशिश कर सकता है। मुत्ताकी की भारत यात्रा इसी रणनीतिक संतुलन का संकेत मानी जा रही है।

🔸 पाकिस्तान पर मनोवैज्ञानिक दबाव

भारत का पड़ोसी पाकिस्तान लंबे समय से अपने धार्मिक एजेंडे के जरिए भारत में तनाव फैलाने की कोशिश करता रहा है। लेकिन यदि अफगानिस्तान—जो एक इस्लामी देश है—भारत के साथ खड़ा रहता है, तो इससे पाकिस्तान की “मुस्लिम वर्ल्ड लीडरशिप” की छवि को गहरा धक्का लगेगा।

दिल्ली विश्वविद्यालय की राजनीति विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. सोनाली चितलकर का कहना है कि “अफगानिस्तान से भारत की दोस्ती हर हाल में हमारे हित में है। पाकिस्तान के धार्मिक कार्ड का यह सबसे सटीक जवाब हो सकता है।”

उन्होंने कहा कि भारत पहले से ही अफगानिस्तान में विकास और निर्माण कार्यों में सहयोग करता रहा है, जिससे वहां भारत की “सॉफ्ट पावर” की छवि बनी है। यही कारण है कि आम अफगानी जनता भारत को भरोसेमंद साझेदार मानती है।

🔸 तालिबान का बदलता रुख

तालिबान के शासनकाल में चरमपंथ की आशंका बनी हुई है, लेकिन हाल के संकेत बताते हैं कि सत्ता संभालने के बाद तालिबान ने व्यावहारिक रुख अपनाने की कोशिश की है। अंतरराष्ट्रीय संपर्कों और दबाव के कारण वे खुद को बदलने पर मजबूर हैं। उदाहरण के लिए, अफगान सरकार ने महिला पत्रकारों से बातचीत से पहले इनकार किया, लेकिन बाद में उन्हें बुलाकर साक्षात्कार दिया — यह बदलाव का संकेत माना जा रहा है।

🔸 भारत के लिए कूटनीतिक अवसर

भारत यदि तालिबान सरकार से संवाद जारी रखता है, तो इससे उसे दो प्रमुख फायदे होंगे:

  1. पाकिस्तान को क्षेत्रीय स्तर पर अलग-थलग करना, और

  2. मध्य एशिया तक अपनी सीधी पहुंच बनाना।

इसके अलावा, आतंकवाद और कट्टरपंथ के खिलाफ साझा रणनीति भी भारत की सुरक्षा नीति को मजबूत बनाएगी। भारत के लिए यह मौका है कि वह संवाद और सहयोग के जरिये तालिबान को वैश्विक व्यवहार के दायरे में लाए, जैसा कि विशेषज्ञ मानते हैं—”ताकत से नहीं, संवाद से बदलाव आता है।”

भारत-अफगानिस्तान के बीच बढ़ते रिश्ते सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से भी बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। यदि भारत इन संबंधों को सावधानी से आगे बढ़ाता है, तो यह न केवल दक्षिण एशिया में उसकी स्थिति को मजबूत करेगा बल्कि पाकिस्तान और चीन की संयुक्त रणनीति को भी चुनौती देगा। अफगानिस्तान की स्थिरता में भारत की भूमिका भविष्य की एशियाई कूटनीति का एक निर्णायक अध्याय साबित हो सकती है।


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