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सऊदी पर हूती हमलों के बीच पाकिस्तान-तुर्की की मदद पर सवाल, क्या मक्का डिफेंस पैक्ट अभी सिर्फ कागजों तक सीमित?

Published on: September 15, 2026
Amidst Houthi attacks on Saudi Arabia

द  देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली/रियाद। सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों के बीच पाकिस्तान और तुर्की की भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे हैं। पिछले महीने दोनों देशों ने सऊदी अरब के साथ मक्का डिफेंस पैक्ट पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते में किसी एक सदस्य पर हमला होने की स्थिति में सामूहिक सुरक्षा की प्रतिबद्धता जताई गई है, लेकिन मौजूदा हालात में दोनों देशों की सैन्य प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देने से इस समझौते की प्रभावशीलता पर बहस शुरू हो गई है।

इसी बीच हूती विद्रोहियों के यमन के तटीय इलाके में सक्रिय होने और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास रणनीतिक ठिकानों पर नियंत्रण के दावों ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्टों के मुताबिक, क्षेत्र में मौजूद ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन भी रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है और वैश्विक तेल आपूर्ति में इसकी अहम भूमिका है।

तुर्की ने कहा- समझौता अभी पूरी तरह लागू नहीं

मक्का डिफेंस पैक्ट को लेकर आलोचना के बीच तुर्की के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मिडिल ईस्ट आई से बातचीत में कहा कि गठबंधन को अभी से असफल बताना उचित नहीं है। अधिकारी के मुताबिक, समझौते के तहत रक्षा संबंधी जिम्मेदारियां अभी कानूनी रूप से पूरी तरह लागू नहीं हुई हैं।

उन्होंने कहा कि समझौते को प्रभावी बनाने के लिए संबंधित देशों में घरेलू कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। इसके बाद सैन्य ढांचे, संस्थागत व्यवस्था और आपसी समन्वय की प्रक्रिया तैयार की जाएगी। तुर्की के अधिकारी के मुताबिक, संभव है कि समझौते को अक्टूबर में संसद के सामने रखा जाए और इसके बाद संसदीय मंजूरी की प्रक्रिया शुरू हो।

तुर्की की संसद की मंजूरी का तर्क

तुर्की का कहना है कि उसके संविधान के तहत राष्ट्रपति संसद की मंजूरी के बिना इस तरह के सुरक्षा समझौते को पूरी तरह लागू नहीं कर सकते। अधिकारी के मुताबिक पाकिस्तान को भी अपने यहां संसदीय प्रक्रिया पूरी करनी होगी। वहीं सऊदी अरब में शाही आदेश के जरिए समझौते को लागू किए जाने की प्रक्रिया अलग हो सकती है। तुर्की के अधिकारी ने कहा कि यह समझौता केवल एक सामान्य सुरक्षा गठबंधन नहीं है, बल्कि इसे एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में विकसित करने की योजना है।

सैन्य तालमेल बनाने में लगेगा समय

अधिकारी के अनुसार, समझौते के लागू होने के बाद भी तीनों देशों को कई महत्वपूर्ण स्तरों पर काम करना होगा। इसमें संभावित खतरों का संयुक्त आकलन, आपसी सलाह-मशविरा, सैन्य सहयोग और संकट की स्थिति में प्रतिक्रिया के लिए साझा व्यवस्था विकसित करना शामिल है।

उन्होंने कहा कि तीनों देशों को रक्षा और तैयारी की योजनाएं बनानी होंगी तथा सेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी यानी आपसी तकनीकी और सैन्य तालमेल की क्षमता विकसित करनी होगी। इसका मतलब है कि तीनों देशों की सेनाएं, हथियार प्रणालियां, संचार व्यवस्था और संचालन प्रक्रियाएं जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे के साथ प्रभावी ढंग से काम कर सकें।

मक्का पैक्ट को लागू होने में लग सकते हैं कई साल

तुर्की के एक अन्य अधिकारी ने बताया कि इस्तांबुल में हुई तीनों देशों की बैठक में समझौते को संस्थागत रूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण फैसले लिए गए हैं। इनमें सचिवालय स्थापित करना, महासचिव नियुक्त करना और रक्षा मामलों पर नियमित बैठकें करना शामिल है।

हालांकि, अधिकारी ने संकेत दिया कि पूरी व्यवस्था तैयार होने में कई साल तक लग सकते हैं। इसका मतलब यह भी है कि सचिवालय और प्रशासनिक ढांचा तैयार हो जाने भर से यह जरूरी नहीं है कि सदस्य देश किसी मिसाइल या ड्रोन हमले की स्थिति में तत्काल संयुक्त सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार हो जाएंगे।

NATO के आर्टिकल 5 से हो रही तुलना

मक्का डिफेंस पैक्ट की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह बताई जा रही है कि किसी एक सदस्य पर हमला होने को सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा। इसी वजह से इसकी तुलना नाटो के आर्टिकल 5 से की जा रही है। तुर्की के अधिकारी के मुताबिक, समझौते का मसौदा तैयार करते समय इसके निर्माताओं ने नाटो संधि से भी प्रेरणा ली थी। हालांकि, नाटो की तरह प्रभावी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए केवल समझौते पर हस्ताक्षर पर्याप्त नहीं होते। इसके लिए साझा सैन्य योजना, कमांड व्यवस्था, खुफिया सहयोग, अभ्यास और त्वरित प्रतिक्रिया की क्षमता विकसित करना भी जरूरी होता है।

फिलहाल सऊदी अरब पर हूती हमलों के बीच मक्का डिफेंस पैक्ट की वास्तविक उपयोगिता पर सवाल बने हुए हैं। तुर्की का कहना है कि समझौते को पूरी तरह प्रभावी होने में समय लगेगा, जबकि आलोचकों का सवाल है कि अगर तत्काल खतरा सामने है तो सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था कब और कैसे सक्रिय होगी।


इसे भी पढ़ें : रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की बड़ी छलांग, 405 सैन्य उपकरणों का होगा स्वदेशीकरण; भारत में ही होगी खरीद


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