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1945 से पहले डूबे जहाजों का स्टील क्यों खोज रहे वैज्ञानिक? परमाणु परीक्षण से जुड़ा है इसका अनोखा राज

Published on: July 31, 2026
Ships sunk before 1945

द  देवरिया न्यूज़,वॉशिंगटन : दुनिया में होने वाले पहले परमाणु परीक्षण के करीब 80 साल बाद भी उसका असर विज्ञान और तकनीक की दुनिया में देखा जा रहा है। वैज्ञानिक आज भी ऐसे स्टील की तलाश कर रहे हैं, जो 1945 से पहले तैयार किया गया हो। यही वजह है कि समुद्र की तलहटी में पड़े प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान डूबे जहाजों का स्टील बेहद कीमती माना जाता है। इस विशेष धातु को “लो-बैकग्राउंड स्टील” कहा जाता है, जिसका उपयोग अत्यधिक संवेदनशील रेडिएशन डिटेक्टर और वैज्ञानिक उपकरणों के निर्माण में किया जाता है।

परमाणु परीक्षण के बाद बदल गई स्टील की प्रकृति

16 जुलाई 1945 को अमेरिका ने न्यू मैक्सिको में दुनिया का पहला परमाणु परीक्षण “ट्रिनिटी टेस्ट” किया था। इसके बाद हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए गए। आने वाले वर्षों में अमेरिका, सोवियत संघ समेत कई देशों ने खुले वातावरण में सैकड़ों परमाणु परीक्षण किए।

वैज्ञानिकों के अनुसार इन परीक्षणों से कोबाल्ट-60, सीज़ियम-137 और अन्य रेडियोधर्मी तत्व वातावरण में फैल गए। इसके बाद से पृथ्वी के वातावरण में मौजूद हवा में रेडियोधर्मी कणों की बेहद सूक्ष्म मात्रा हमेशा के लिए शामिल हो गई।

आधुनिक स्टील में क्यों आ जाते हैं रेडियोधर्मी अंश?

स्टील बनाने की आधुनिक प्रक्रिया में लोहे को पिघलाने के दौरान बड़ी मात्रा में हवा का उपयोग किया जाता है। चूंकि 1945 के बाद की हवा में सूक्ष्म रेडियोधर्मी तत्व मौजूद हैं, इसलिए पिघले हुए लोहे के संपर्क में आने पर ये कण नए स्टील की संरचना का हिस्सा बन जाते हैं। हालांकि यह रेडियोधर्मिता इतनी कम होती है कि इससे इंसानों या सामान्य उपयोग पर कोई खतरा नहीं होता, लेकिन अत्यधिक संवेदनशील वैज्ञानिक उपकरणों के लिए यह बड़ी चुनौती बन जाती है।

रेडिएशन डिटेक्टरों में आती है ‘बैकग्राउंड नॉइज’

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि न्यूट्रिनो डिटेक्टर, गीगर काउंटर, मेडिकल इमेजिंग मशीन, अंतरिक्ष अनुसंधान उपकरण या अन्य अत्यधिक संवेदनशील रेडिएशन डिटेक्टर आधुनिक स्टील से बनाए जाएं, तो स्टील में मौजूद सूक्ष्म रेडियोधर्मिता मशीन की माप को प्रभावित कर सकती है।

इसे वैज्ञानिक भाषा में “बैकग्राउंड नॉइज” कहा जाता है। ऐसी स्थिति में उपकरण बाहरी रेडिएशन की बजाय अपने ही ढांचे से निकलने वाले सूक्ष्म संकेत दर्ज करने लगते हैं, जिससे शोध के परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।

इसलिए समुद्र में खोजे जा रहे पुराने जहाज

1945 से पहले बने और युद्ध के दौरान समुद्र में डूबे जहाज परमाणु परीक्षणों के बाद वातावरण में फैले रेडियोधर्मी तत्वों के संपर्क में नहीं आए थे। साथ ही समुद्र का पानी प्राकृतिक रेडिएशन शील्ड की तरह काम करता है, जिससे इन जहाजों का स्टील अपेक्षाकृत शुद्ध बना रहता है।

इसी कारण वैज्ञानिक और अनुसंधान संस्थान ऐसे पुराने जहाजों के स्टील को बेहद मूल्यवान मानते हैं और विशेष अनुमति के साथ उन्हें समुद्र की तलहटी से निकालकर वैज्ञानिक प्रयोगों में इस्तेमाल करते हैं।

सीमित है लो-बैकग्राउंड स्टील की उपलब्धता

अमेरिकी ऊर्जा विभाग (US Department of Energy) और पैसिफिक नॉर्थवेस्ट नेशनल लैबोरेटरी जैसी संस्थाओं के अनुसार, द्वितीय विश्व युद्ध से पहले का शुद्ध स्टील अब बेहद सीमित मात्रा में बचा है। यही वजह है कि दुनिया भर में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में वैज्ञानिक अनुसंधान और अंतरिक्ष मिशनों के लिए ऐसे स्टील का महत्व और बढ़ सकता है, क्योंकि अत्यधिक सटीक माप वाले उपकरणों के लिए आज भी यह सबसे भरोसेमंद सामग्री मानी जाती है।


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