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लिपुलेख दर्रे पर नेपाल का कड़ा ऐतराज, भारत-चीन से जताया विरोध

Published on: May 5, 2026
Nepal's Kada on Lipulekh Pass
द  देवरिया न्यूज़,काठमांडू : कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख दर्रे के इस्तेमाल को लेकर नेपाल ने भारत और चीन दोनों के सामने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कहा है कि यह दर्रा उसकी संप्रभु सीमा में आता है और बिना काठमांडू की सहमति के किसी भी देश को इसका उपयोग करने का अधिकार नहीं है। इस बयान के बाद दक्षिण एशिया में एक बार फिर क्षेत्रीय विवाद चर्चा में आ गया है।
नेपाल सरकार ने कूटनीतिक माध्यमों से दोनों देशों को अपनी आपत्ति से अवगत कराया है और लिपुलेख क्षेत्र को अपना अभिन्न हिस्सा बताते हुए वहां किसी भी तरह की गतिविधि से बचने की अपील की है। नेपाल में इस मुद्दे को लेकर आम जनता भी भावनात्मक रूप से जुड़ी हुई है, जिससे सरकार पर सख्त रुख अपनाने का दबाव बना हुआ है।
इस विवाद की जड़ें 1816 की सुगौली संधि में मानी जाती हैं, जो एंग्लो-नेपाल युद्ध के बाद हुई थी। इस संधि के तहत काली नदी (महाकाली) को नेपाल की पश्चिमी सीमा माना गया। नेपाल का दावा है कि इस नदी का वास्तविक उद्गम लिम्पियाधुरा में है, जिसके आधार पर कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्र नेपाल के हिस्से में आते हैं। ये क्षेत्र रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यहां भारत, नेपाल और तिब्बत (चीन) की सीमाएं मिलती हैं।
वहीं भारत का रुख अलग है। भारत का कहना है कि काली नदी का उद्गम लिपुखोला के पास है, जिससे ये विवादित क्षेत्र भारतीय सीमा में आते हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद भारतीय सेना ने कालापानी क्षेत्र में चौकियां स्थापित की थीं, जो आज भी कायम हैं।
यह विवाद वर्ष 2020 में उस समय और तेज हो गया था, जब भारत ने उत्तराखंड के धारचूला से लिपुलेख दर्रे तक करीब 80 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण किया। भारत ने इसे कैलाश मानसरोवर यात्रा को आसान बनाने और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण परियोजना बताया, जबकि नेपाल ने इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन करार दिया।
इसके जवाब में तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने कड़ा विरोध दर्ज कराया और नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को अपने क्षेत्र में दिखाया गया। नेपाल की संसद ने भी इस नक्शे को मंजूरी दे दी, जिससे यह मुद्दा संवैधानिक स्वरूप ले चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लिपुलेख विवाद का समाधान आसान नहीं है, क्योंकि यह क्षेत्र सामरिक और भू-राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। भारत जहां अपनी सुरक्षा और आधारभूत ढांचे को मजबूत करने पर जोर दे रहा है, वहीं नेपाल अपनी क्षेत्रीय दावेदारी पर अडिग है। चीन की मौजूदगी इस समीकरण को और जटिल बना देती है।
फिलहाल नेपाल ने संकेत दिए हैं कि वह इस मुद्दे को कूटनीतिक स्तर पर आगे बढ़ाता रहेगा, लेकिन निकट भविष्य में किसी ठोस समाधान की संभावना कम ही नजर आती है। यह विवाद भारत-नेपाल संबंधों में समय-समय पर तनाव का कारण बनता रहा है और आगे भी बना रह सकता है।

इसे भी पढ़ें : पाकिस्तान ने चीनी कंपनी को दी गधों के मांस निर्यात की मंजूरी, देरी पर विवाद के बाद लिया गया फैसला


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