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धार्मिक संस्थाओं में अराजकता नहीं चलेगी: सुप्रीम कोर्ट, कहा—प्रबंधन के लिए नियम और ढांचा जरूरी

Published on: April 29, 2026
anarchy in religious institutions

द  देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी धार्मिक संस्था के प्रबंधन का अधिकार असीमित नहीं हो सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रबंधन के नाम पर अराजकता की स्थिति नहीं हो सकती और हर धार्मिक स्थल के संचालन के लिए एक तय ढांचा और नियम होना आवश्यक है।

यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान पीठ ने की। पीठ केरल के शबरिमला मंदिर समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश, भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।

सुनवाई के दौरान क्या कहा कोर्ट ने

सुनवाई के दौरान हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से जुड़े मामले में दलील पेश करते हुए वकील निजाम पाशा ने कहा कि दरगाह वह स्थान होता है, जहां किसी सूफी संत को दफनाया गया हो और सूफी परंपरा में ऐसे स्थलों के प्रति गहरी आस्था होती है। उन्होंने बताया कि भारत में सूफी परंपरा के तहत चिश्तिया, कादरिया, नक्शबंदिया और सुहरावर्दिया जैसे कई प्रमुख सिलसिले हैं।

वकील ने दलील दी कि किसी धार्मिक संस्था में प्रवेश को नियंत्रित करना भी उसके प्रबंधन का हिस्सा है। इस पर जस्टिस अमानुल्ला ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रबंधन का अधिकार होने का मतलब यह नहीं है कि कोई स्पष्ट व्यवस्था या ढांचा ही न हो।

“हर संस्था में होना चाहिए नियमन”

जस्टिस अमानुल्ला ने कहा, “चाहे मंदिर हो या दरगाह, हर संस्था के संचालन के लिए एक निर्धारित प्रक्रिया और व्यवस्था होनी चाहिए। अराजकता की स्थिति स्वीकार्य नहीं है। यह नहीं हो सकता कि हर व्यक्ति अपनी मर्जी से कुछ भी करे या किसी भी समय बिना नियंत्रण के प्रवेश करे।”

उन्होंने आगे कहा कि किसी भी धार्मिक संस्था में यह तय होना चाहिए कि प्रबंधन कौन करेगा और किस प्रकार से कार्यों का संचालन होगा। यह नियमन आवश्यक है, लेकिन यह संविधान की सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकता।

संवैधानिक दायरे में ही होगा प्रबंधन

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के साथ-साथ समानता और गैर-भेदभाव जैसे संवैधानिक सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य है। किसी भी संस्था को ऐसे नियम बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जो व्यापक संवैधानिक मानकों के खिलाफ हों। पीठ ने कहा कि हर संस्था के लिए स्पष्ट नियम होने चाहिए और इन्हें व्यक्तिगत इच्छानुसार तय नहीं किया जा सकता। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी माना कि किसी धार्मिक प्रथा को “आवश्यक” या “गैर-आवश्यक” घोषित करना न्यायिक रूप से बेहद जटिल कार्य है। फिलहाल, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है और आने वाले दिनों में इस पर महत्वपूर्ण फैसला आ सकता है।


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