द देवरिया न्यूज़,तेहरान : होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव ने अब एक नया मोड़ ले लिया है, जिसमें चीन की एंट्री की आशंका भी तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर अमेरिकी नौसेना ने इस अहम समुद्री मार्ग पर जहाजों की आवाजाही को सीमित करने की कार्रवाई शुरू कर दी है। इसके बाद चीन ने कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कहा है कि कोई भी तीसरा देश उसे ईरान से तेल लाने से नहीं रोक सकता।
दरअसल, होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल सप्लाई का बड़ा हिस्सा गुजरता है। चीन, जो ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, इस मार्ग पर काफी हद तक निर्भर है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन के कुल तेल आयात का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से आता है। ऐसे में अमेरिकी नाकेबंदी सीधे तौर पर चीन के ऊर्जा हितों को प्रभावित करती है।
अमेरिका ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह ईरान से आने वाले तेल टैंकरों, खासकर चीन से जुड़े जहाजों को रोक सकता है। इसके जवाब में चीन के रक्षा अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि उनके जहाजों के रास्ते में बाधा डालना गंभीर परिणाम ला सकता है। इससे दोनों महाशक्तियों के बीच तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह टकराव सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापक रणनीतिक संघर्ष का रूप ले सकता है। कनाडाई भू-राजनीतिक विश्लेषक दिमित्री लास्करिस के अनुसार, “अमेरिका का यह कदम न केवल ईरान बल्कि चीन के साथ भी टकराव को बढ़ावा देता है। चीन की ऊर्जा जरूरतें उसे इस स्थिति में निष्क्रिय रहने की अनुमति नहीं देतीं।”
हाल के महीनों में चीन ने इस क्षेत्र में अपनी नौसैनिक गतिविधियां भी बढ़ाई हैं। जिबूती स्थित अपने सैन्य अड्डे से चीनी नौसेना के जहाज खाड़ी क्षेत्र के करीब सक्रिय हैं। फरवरी में चीन ने ओमान की खाड़ी के पास एक आधुनिक युद्धपोत भी तैनात किया था। इसके अलावा, हाल ही में कुछ चीनी मालवाहक विमान तेहरान पहुंचे, जिनमें सैन्य सामग्री होने की आशंका जताई जा रही है।
रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर हालात और बिगड़ते हैं तो चीन अपने युद्धपोतों को फारस की खाड़ी में भेज सकता है, ताकि अपने तेल टैंकरों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना है और वह पहले भी अदन की खाड़ी में एंटी-पाइरेसी मिशनों के तहत अपनी मौजूदगी दिखा चुका है।
हालांकि, अमेरिका की सैन्य ताकत अभी भी कई मामलों में आगे है, खासकर एयरक्राफ्ट कैरियर और वैश्विक तैनाती के लिहाज से। ऐसे में किसी भी प्रत्यक्ष टकराव की स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है।
फिलहाल चीन ने कोई आक्रामक कदम नहीं उठाया है, लेकिन होर्मुज में अमेरिकी नाकेबंदी ने स्थिति को बेहद संवेदनशील बना दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या चीन केवल कूटनीतिक दबाव बनाए रखता है या फिर अपने रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए सैन्य कदम भी उठाता है।
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