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भारत ने तैयार किया रूस के घातक T-90 टैंक का 1000वां यूनिट, लेकिन भविष्य को लेकर उठ रहे सवाल

Published on: May 26, 2026
India prepared Russia's deadly

द  देवरिया न्यूज़,मॉस्को/नई दिल्ली : भारत ने रूस के प्रसिद्ध T-90 मुख्य युद्धक टैंक (Main Battle Tank) का 1000वां यूनिट तैयार कर एक बड़ी रक्षा उपलब्धि हासिल की है। तमिलनाडु स्थित हेवी व्हीकल्स फैक्ट्री (HVF) में तैयार किया गया यह टैंक भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता और सैन्य आधुनिकीकरण की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। यह निर्माण 2006 में भारत और रूस के बीच हुए लाइसेंस उत्पादन समझौते के तहत किया गया है।

इस समझौते के अनुसार भारत को 1,000 T-90 टैंकों के निर्माण की अनुमति मिली थी। पहला टैंक वर्ष 2009 में तैयार हुआ था। पिछले लगभग दो दशकों में भारत ने इन टैंकों के निर्माण में स्वदेशीकरण का स्तर काफी बढ़ा दिया है। अब T-90 टैंकों में इस्तेमाल होने वाले लगभग 80 प्रतिशत पुर्जे भारत में ही बनाए जा रहे हैं। इससे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को भी मजबूती मिली है।

हेवी व्हीकल्स फैक्ट्री 1961 से भारत की प्रमुख बख्तरबंद वाहन निर्माण इकाई रही है। T-90 से पहले यहां सोवियत मूल के T-72 टैंकों का निर्माण किया जाता था। भारतीय सेना के पास वर्तमान में करीब 2,500 T-72 टैंक हैं, जिन्हें धीरे-धीरे हटाकर आधुनिक T-90 टैंकों को फ्रंटलाइन पर तैनात किया जा रहा है।

पाकिस्तान की चुनौती के बाद भारत ने चुना T-90

T-90 टैंकों को भारतीय सेना में शामिल करने के पीछे 1990 के दशक की सुरक्षा चुनौतियां बड़ी वजह थीं। उस समय पाकिस्तान ने यूक्रेन से 320 आधुनिक T-80UD टैंक खरीदे थे, जिससे उसकी सैन्य क्षमता काफी बढ़ गई थी। पाकिस्तान के पास आधुनिक नाइट विजन और बेहतर फायरपावर वाले टैंक आने के बाद भारतीय सेना पर दबाव बढ़ा कि वह भी अपने पुराने T-72 टैंकों का विकल्प तलाशे।

भारत उस समय अपने स्वदेशी अर्जुन मुख्य युद्धक टैंक (Arjun MBT) के विकास पर काम कर रहा था, लेकिन तकनीकी देरी और भारी वजन जैसी समस्याओं के कारण सेना ने उसे बड़े पैमाने पर स्वीकार नहीं किया। ऐसे में भारत ने रूस से T-90 टैंक खरीदने का फैसला किया।

भारत के सौदे ने रूस की टैंक इंडस्ट्री को दी थी नई जिंदगी

1990 के दशक के अंत में सोवियत संघ के टूटने के बाद रूस गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था। रूस की प्रमुख टैंक निर्माता कंपनी उरलवागोनज़ावोड (Uralvagonzavod) भी मुश्किल हालात में थी। उस समय रूस के पास T-90 का आधुनिक डिजाइन तैयार था, लेकिन खुद रूसी सेना के पास बड़े ऑर्डर देने के लिए पर्याप्त धन नहीं था।

ऐसे समय में भारत ने 15 फरवरी 2001 को रूस के साथ 310 T-90S टैंकों की खरीद का बड़ा समझौता किया। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के इस सौदे ने रूस की टैंक इंडस्ट्री को बचाने में अहम भूमिका निभाई थी।

यूक्रेन युद्ध के बाद टैंकों के भविष्य पर बहस

हालांकि T-90 को कभी दुनिया के सबसे घातक टैंकों में गिना जाता था, लेकिन अब इसके भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे हैं। यूक्रेन युद्ध में रूस के कई T-90 टैंक ड्रोन हमलों और आधुनिक एंटी-टैंक मिसाइलों के सामने तबाह होते देखे गए हैं। इससे दुनिया भर में भारी-भरकम टैंकों की उपयोगिता और सुरक्षा पर बहस तेज हो गई है।

इसके अलावा चीन ने अपनी सेना में अगली पीढ़ी का “Type-100” टैंक शामिल कर लिया है, जिसे अत्याधुनिक तकनीक से लैस माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीकी स्तर पर T-90 अब नई पीढ़ी के टैंकों से पीछे छूटता दिखाई दे रहा है।

भारत की आगे की रणनीति क्या होगी?

यूक्रेन युद्ध के कारण रूस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का असर भारत के रक्षा सहयोग पर भी पड़ सकता है। हालांकि भारत अब अधिकांश पुर्जे खुद बना रहा है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण तकनीकों और अपग्रेड के लिए अभी भी रूस पर निर्भरता बनी हुई है।

इसी चुनौती को देखते हुए भारत दो मोर्चों पर काम कर रहा है। पहला, रूस भारत को अपने अत्याधुनिक T-14 आर्मटा टैंक की पेशकश कर रहा है। दूसरा, भारत खुद “फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल” (FRCV) कार्यक्रम पर काम कर रहा है, जिसका उद्देश्य भविष्य की जरूरतों के अनुरूप अत्याधुनिक टैंक विकसित करना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत को पारंपरिक टैंक युद्ध और आधुनिक ड्रोन तकनीक के बीच संतुलन बनाकर अपनी सैन्य रणनीति तय करनी होगी।



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